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ये जालिम इश्क
May 22, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
अनछुए प्रेम में जोगन सी मचलना,
प्रेम गीत में मीरा की तरह झूमना,
मन ही मन उदडे हुए ख्वाबों को बुनना,
राधा की तरह श्री कृष्णा को चुनना,
 
ये जालिम इश्क कभी ना करना...।।
 
गहरी छाव में आंख मूंद खुद से बात करना,
प्रेम की बाहों में पतझ़ड बन कर बिखरना,
अनछुए अहसास को छूकर निखरना,
आइने में खुद को निहार कर सवरना,
 
ये जालिम इश्क कभी ना करना...।।
 
टूटते तारो से किसी को मांगना,
इश्क में धर्मो को लंगना
मंदिर मस्जिद जाकर किसी को मांगना,
वर्त कर्म के भोग लगाना,
 
ये जालिम इश्क कभी ना करना...
 
टूटते तारो से किसी को मांगना,
इश्क में धर्मो को लंगना
मंदिर मस्जिद जाकर किसी को मांगना,
वर्त कर्म के भोग लगाना,
 
ये जालिम इश्क कभी ना करना...
 
रोते रोते हाथ आसुओं से भर जाना,
मुंह में कपड़ा रख जोर से चिलाना,
मन के आसुओं को सब से छुपाना,
टूटे दिल को बार बार समझाना,
 
ये जालिम इश्क कभी ना करना...।।