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स्त्री होना माने एक समूचा इंतज़ार होना
May 19, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
स्त्री होना माने एक समूचा इंतज़ार होना ,
स्त्री होना माने जिनको कभी पूरा ना होना ,
स्त्री होना माने जैसे तमाम अधबुने सपने बुनना ।
 
स्त्री होना माने सोचकर हंसना और ठहरकर बोलना ,
स्त्री होना माने फटी हुई चीजें सिलना,
और चीजों के फटने का इलज़ाम सहना ,
स्त्री होना माने मर्द की नज़र में 
हर वक्त बेमतलब का बतियाते रहना ,
और घर के कुछ बेकार से काम करना ।
जिनके पूरा ना होने पर उसके आदमी का
भट्ठी से भी ज्यादा तेज़ जलना और तपना ।
 
स्त्री होना माने एक समूचा घर संवारना ,
और उसके बिखरने का दंश बर्दाश्त करना ,
स्त्री होना माने वे सारे काम करना ,
जिनके ना होने से घर का घर न रहना ,
मगर उसके लिए भी कोई "डिमांड"न करना ।
 
स्त्री होना माने अथाह दैहिक खूबसूरती का होना,
साथ ही बुद्धि का घुटने में टँगा सा रहना ,
स्त्री होना माने अपनी संभावित जगह से परे रहना, 
और किसी नामालुम सी सम्मानजनक जगह पर 
पहुँचने की तमाम उम्र रस्साकस्सी करते रहना।
 
स्त्री होना माने किसी किसी के लिए तो 
मर्द पे डोरे डालने वाली एक वेश्या होना,
और जिसके झांसे में वो ना आ पाए ,
उसके लिए नरक का द्वार होना !!
 
स्त्री होना माने बहुत सी पीड़ाओं को 
अनवरत चुपचाप पीते जाना ,
और उसी समय हँसते रहने का ढोंग भी करना !!
 
स्त्री होने का मतलब यूँ तो जन्म देना भी है 
मगर उससे जन्म लेने वाले का उसके प्रति 
ज़रा भी अहसानमंद न होना ।
 
हे भगवान् !!
तू स्त्री ना बनाता तो दुनियां कभी हरी-भरी न रह पाती ,
दुनियां कभी प्यार के दो पल न पा पाती ,
मगर तूने स्त्री को जो हालात बख्शे ,
मैं पूछती हूँ तूने स्त्री को क्यूँ बनाया 
और अगर जो तूने उसे बना ही डाला ,
तो मर्द को भी उसे संभालने के संस्कार और 
सलाहियत भी तो देता !!
 
रीमा मिश्रा"नव्या"
आसनसोल(पश्चिम बंगाल)