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राधा का कृष्ण ज्ञान
June 3, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
    एक बार कृष्ण के सखा उद्धव जी जो ज्ञान और योग सीख कर उसकी महत्ता बताने में लगे थे तब ,कृष्ण ने उन्हें एक चिट्ठी लिख कर दी जिस पर कृष्ण ने लिखा था कि " मैं अब वापस नहीं आऊंगा तुम सभी मुझे भूल जाओ और योग में ध्यान लगाओ " और कहा कि इसे ले जाकर ब्रज के लोगों को दिखाना और योग के महत्व से उन्हें परिचित करवाना ।उद्धव जी के लिए परमब्रह्म का लिखा लेख वेद समान था वे उसे संभाले संभाले ब्रज में गए और कृष्ण विरह में व्याकुल राधा जी को वह पाती दिखाई , राधा रानी ने उसे पढ़े बिना गोपियों को दे दी और गोपियों ने उसे पढ़े बिना उसके कई टुकड़े कर आपस में बाँट लिया । उद्धव जी बौखला गए , चिल्लाने लगे अरे मूर्खो इस पर जगदगुरु ने योग का ज्ञान लिखा है , क्या तुम कृष्ण विरह में नहीं हो जो उनका लिखा पढ़ा तक नहीं ।
तब राधा जी ने उद्धव को समझाया--
 उधौ तुम हुए बौरे, पाती लेके आये दौड़े...हम योग कहाँ राखें ? यहां रोम रोम श्याम है "
अर्थात हे !उधौ कृष्ण तो यहां से गए ही नहीं ... कृष्ण होंगे दुनिया के लिए योगेश्वर यहां पर तो अब भी वो धूल में सने हर घाट वृक्ष पर बंसी बजा रहे हैं । बताओ कहाँ है विरह ...? 
यह ज्ञान आज के युग के लिए एक मार्ग दर्शन है , जब कि हम कृष्ण को आडम्बरों में खोजते हैं ...।
आखिर क्यों नहीं हो पाया राधा कृष्ण का भौतिक मिलन :---
मथुरा जाते समय राधा रानी ने कृष्ण का रास्ता रोका था , मगर कृष्ण ने उन्हें समझाया था कि यदि मैं तुमसे बंध गया तो मेरे जन्म का प्रायोजन व्यर्थ चला जाएगा, जगत में पाप और अधर्म का साम्राज्य फैलता ही जाएगा ।मैं प्रेमी बनकर संहार नहीं साध सकता , मैं ब्रज में रहकर युद्ध नहीं रचा सकता , मैं बांसुरी बजाते हुए चक्र धारण नहीं कर सकता , और यह सत्य भी है कि राधा से विरह के बाद कृष्ण ने कभी बांसुरी को हाथ नहीं लगाया ...।
कृष्ण ने मथुरा जाते समय राधा से साथ चलने को कहा था , किन्तु राधा भी कृष्ण की गुरु थीं , वे समझ सकती थीं कि जिसे संसार को मोह से मुक्ति का पथ सिखाना है , उसे मोह में बाँध कर मैं समय चक्र को नहीं रोकूंगी ,और उन्होंने कृष्ण से वचन लिया कि वे जब अपने जन्म -अवतार के सभी उद्देश्यों को पूर्ण कर लें तब लौट आएं , और ऐसा हुआ भी कृष्ण अपने जन्म के सभी प्रायोजनों को पूर्ण कर , और अपने अवतार के कर्तव्य से मुक्त हो सदैव राधा के हो गए ।वे अब ना द्वारिका में मिलते हैं, और ना ही कुरुक्षेत्र में , वे तो आज भी ब्रज की भूमि पर राधा रानी के साथ धूल उड़ाते दौड़ते जाते हैं...दूर तक...।
राधा के कृष्णा से कुछ कड़वे संवाद जिनका उतर भगवान कृष्ण के पास भी नहीं था:--
भगवान कृष्ण से द्वारकाधिश कृष्णा और राधा  स्वर्ग में विचरण कर रहें थे, तभी अचानाक दोंनो एक-दूसरे के सामने आ गए कृष्ण तो विचलित हो गए और राधा प्रसन्नचित हो उठी, कृष्ण सकपकाए और राधा मुस्कुराई।  इससे पहले कि कृष्ण कुछ कहते इतने राधा बोल उठी-- ‘ कैसे हो द्वारकाधीश ...?? 
जो राधा उन्हें, कान्हा कान्हा कह के बुलाया कर ती थी उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया...। 
फिर भी कृष्ण  अपने आपको संभालते हुए बोले राधा से, “ मैं तो तुम्हारे लिए आज भी वही कान्हा हूँ "।
तुम्हारे बिना मेरा हाल कैसा होगा राधे...?
राधा बोली मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ न तुम्हारी याद आई न आंसू बहा क्यूंकि हम तुम्हैं कभी भुले ही कहाँ थे जो तुम याद आते...।
कुछ कडवे सच और प्रश्न सुन पाए तो सुनाऊ आपको ...?
क्या तुमने कभी सोचा की इस तरक्की में तुम कितना पिछड गए... ?
यमुना के मिठे पानी से जिंदगी शुरु की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुँच गए ...?
एक ऊंगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और दसों ऊंगलिओ पर चलने वाली बांसुरी को भूल गए ...?
कान्हा जब तुम प्रेम से जुडे थे तो जो उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाते थे...प्रेम से अलग होने पर उसी ऊंगली ने क्या क्या रंग दिखाया...  ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी, कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊ ...?
अगर तुम कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते, सुदामा तुम्हारे घर नही आते... ।
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है , युद्ध में आप मिटाकर जीतते है और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं ...। कान्हा प्रेम में डुबा हुआ आदमी, दुखी तो रह सकता है पर किसी को दुःख नहीं देता...।
आप तो बहुत सी कलाओं के स्वामी हो, स्वप्न दूर द्रष्टा हो , गीता जैसे ग्रंथ के दाता हो, पर आपने ये कैसे-कैसे निर्णय किया अपनी पूरी सेना कौरवों को सोंप दी, और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया। सेना तो आपकी प्रजा थी राजा तो पालक होता है, उनका रक्षक होता है। आप जैसे महान ज्ञानी उस रथ को चला रहा था, जिस रथ पर अर्जुन बेठा था । आपकी प्रजा को ही मार रहा था, अपनी प्रजा को मरते देख आपमें करुणा नहीं जगी।
क्यों, क्योंकि आप प्रेम से शुन्य हो चुके थे आज धरती पर जाकर देखो अपनी द्वारकाधिश वाली छवि को ढुंढ्ते रह जाओगे ।हर घर, हर मंदिर, में मेरे साथ ही खडे नजर आओगे। आज भी मैं मानती हूँ कि लोग आपकी लिखी हुई गीता के ज्ञान की बातें करते है ।
उनके महत्व की बात करते है, मगर धरती के लोग युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते है..., और गीता मे कहीं मेरा नाम भी नही लेकिन गीता के समापन पर राधे-राधे करते है”...।
राधा-कृष्ण प्रेम की एक रोचक कथा--
यह एक दिलचस्प कहानी है जो राधा और कृष्ण के अंनत प्रेम के संबंध को दर्शाती हैं। राधा ने भगवान कृष्ण से विवाह नहीं किया था, बल्कि राधा के लिए कृष्ण के अतृप्त प्रेम को देखकर दासियों को ईर्ष्या होती थी।
एकबार  राधा को परेशान करने के लिए उन्होंने एक शरारती योजना बनाई और उन्होंने गर्म दूध का गरमागरम तपता हुआ कटोरा लिया है और उन्होंने राधा को वह कटोरा दिया और कहा कि कृष्ण ने यह दूध का कटोरा उनके लिए भेजा है, और राधा ने गर्म दूध पी लिया।
 
जब दासियाँ कृष्ण के पास लौटी, तो उन्होंने कृष्ण के दर्दनाक छाले देखे। यह दर्शाता है कि कृष्ण राधा के हर छिद्र में रहते हैं, इसलिए गर्म दूध से राधा को कुछ नहीं हुआ, लेकिन गर्म दूध ने कृष्ण को प्रभावित किया। श्री कृष्ण ने उनके सभी दर्द और दुखों को खुद पर ले लिया...।
--राधा-कृष्ण प्रेम आधारित दूसरी कहानी--
यह राधा और कृष्ण के बीच गहन प्रेम को दर्शाती एक और प्यारी कहानी है। एक बार श्रीकृष्ण बहुत बीमार हो गए थे। कृष्ण ने कहा कि अगर उनको उनके किसी प्रेमी या सच्चे भक्त द्वारा चरणामृत मिलेगा, तो वह ठीक हो जाएगें। सभी गोपीयों से पूछा गया, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव से भय हो कर स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि वे अपने चरणों का जल श्रीकृष्ण को पिलाकर पाप नहीं कर सकती।
जब राधा को जब इस स्थिति के बारे में पता चला, तो  राधे ने कहा: “जितने चरणामृत की ज़रूरत है आप उतना ले सकते है। मुझे तब सुख मिलेगा, जब तक मेरे प्रभु अपने दर्द और बीमारी से मुक्त नहीं हो जाते।” राधा ने सहृदय प्रेम के साथ चरणामृत दिया। यह इस तथ्य के कारण है; यह माना जाता है कि राधा भगवान कृष्ण से विवाह नहीं कर सकी। राधा कृष्ण को उनके दिल से आंतरिक रूप से प्रेम करती थी लेकिन फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण को उनकी बीमारी से बचाने के लिए कृष्ण को चरणामृत दिया।
राधा और कृष्ण दिव्य प्राणियों में से एक थे और उनका प्यार अनन्त था। चाहे वे विवाह करते या नहीं, उनके प्रेम ने उन्हें हमेशा के लिए एकजुट कर दिया और आज भी लोग उनकी पूजा करते हैं,राधे-कृष्ण कहते हैं...!!राधे-कृष्ण...राधे-कृष्ण...!!
रीमा मिश्रा"नव्या"
आसनसोल(पश्चिम बंगाल)