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फिल्म जगत में खलनायक की भूमिका निभाने वाला असल ज़िन्दगी का सबसे बड़ा नायकः सोनू सूद
May 29, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख

पर्दा उठने के बाद खलनायक का किरदार पर्दे के पीछे सबसे बड़े नायक के किरदार निभा रहा सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ पर हकीकत में यह पूर्णतः सत्य है। कहा जाता है कि अभिनय एक ऐसी कला है जो स्वभावानुरूप होती है क्योंकि कोई भी कला व्यक्ति में प्रकृति प्रदत्त होती है मगर इन सभी परिभाषाओं को झूठा साबित करने वाला यह किरदार (सोनू सूद) अपने व्यावसायिक अभिनय से इतर मजदूरों-मजबूरों के सबसे बड़े नायक बन कर उभर रहे हैं। असल ज़िन्दगी में उनकी नायक की भूमिका काबिले तारीफ है। इन्होंने यह साबित करके दिखा दिया कि पर्दे का अभिनय चारित्रिक हो यह जरूरी नहीं!
आज कोरोना जैसी खतरनाक महामारी के चलते लाखों-करोड़ों मजदूरों का रोजगार छिन जाना बेहद ही दुखद स्थिति है। मजदूर अपने-अपने घर की तरफ पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। भूखे-प्यासे मजदूरों की मदद के लिए आगे आने वाले असली हीरो सोनू सूद ने अब तक हजारों मजदूरों की सहायता करते हुए रास्ते में फँसे इन मजदूरों को उनके परिवार से मिलाया। तन-मन-धन तीनों तरीकों से सोनू सूद ने बेसहारा बेबस मजदूरों को आगे बढ़कर उठाया और उनकी हर संभव मदद की। सोनू सूद के हर शब्दों में इन गरीब मजदूरों के प्रति संवेदना और सहानुभूति साफ झलकती है जिसका जीता-जागता उदाहरण उन्होंने राष्ट्र के सम्मुख पेश भी किया। उन्होंने हर राज्य की सरकारों से सम्पर्क साधते हुए रास्ते में पैदल फँसे मजदूरों को उनके परिवार से मिलाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
मजदूरों की सहायता में अकेले निकले सोनू सूद को उनके माता-पिता का पूरा सहयोग मिला उनके माता-पिता ने कहा कि गिरते को उठा लेना असली अभिनय है। इन्हीं बातों से प्रभावित सोनू सूद मजदूरों की सहायता में आगे आए और देखते ही देखते एक कारवां बन गया। इन्होंने मजदूरों की सहायता हेतु हेल्पलाइन नंबर की शुरुआत की जिस पर कुछ ही घंटों में ६०-७० हजार कॉल आ गए और इनकी सहायता में सोनू सूद की पूरी टीम ने चौबीसों घंटे काम करना शुरू कर दिया जिससे टिकटों का फार्म न भर पाने वाले मजदूर जो पैदल चलने को विवश थे उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचाया गया और अनवरत यह कार्य अब भी जारी है।
सोनू सूद ने अपने मनोभाव को एक प्रेस साक्षात्कार में व्यक्त करते हुए कहा कि आज इस विकट परिस्थिति में जिन मजदूरों को हमने बेबस लाचार बेसहारा रास्ते पर मरने के लिए छोड़ दिया है ये वो मजदूर हैं जिन्हें अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है इन्होंने हमारे लिए घर बनाया, कल-कारखानें बनाए हमारे उद्योगों को प्रगति देकर हमें आम आदमी से उद्योगपति का दर्जा दिलाया हम जहाँ अभिनय करते हैं उन सभी सेटों को बनाया आज उन्हीं मजदूरों को हम सड़कों पर मरने के लिए कैसे छोड़ सकते हैं? क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि आज इस कोरोना काल में उनकी थोड़ी सी मदद करें! हम इतने खुदगर्ज कैसे हो सकते हैं। उन्होंने ने रास्ते में दम तोड़ देने वाले मजदूरों के लिए सिस्टम पर भी सवाल उठाए अगर इन मजदूरों को सिस्टम से उनके घर पहुँचाया जाता तो शायद यह हादसा टाला जा सकता था। उन्होंने भावुक होकर कहा कि मैंने नजदीक से उन मजदूरों को देखा है जिनकी आँखों में बेसहारा होने के आँसू थे आखिर हमारी अर्थव्यवस्था के इस रीढ़ को 'प्रवासी' नाम देना उचित है क्या?
अन्ततः इतना कहना चाहूंगा कि अगर हमारे देश के सभी नेता-अभिनेता अगर सोनू सूद के किरदार का अनुसरण करते तो आज शायद स्थिति कुछ और होती। हमारे मजदूरों को प्रवासी का खिताब नहीं मिलता और वह रास्ते में भूख-प्यास से दम नहीं तोड़ते। अगर एक अकेला इंसान एक कारवां खड़ा कर हजारों मजदूरों की मदद कर सकता है तो क्या पूरा सिस्टम मिलकर यह नहीं कर सकता ऐसा बिल्कुल नहीं है हमें सोनू सूद से सीख लेना चाहिए और सिस्टम की सक्रियता को सुनिश्चित करना चाहिए। पर्दे की दुनिया का यह खलनायक असल ज़िन्दगी का एक कोहिनूर है जिसने मजदूर बेसहारा लाचार लोगों को सहारा दिया। आज इस शख्स को 'सुपर हीरो' कहना कोई गलत बात नहीं क्योंकि वह इसके लिए डिजर्व करता है। विपक्ष इस विषय को अपना हथियार बना रही है ट्विटर के माध्यम से अपने तंज कसने में जितनी दिलचस्पी दिखा रही है काश यह दिलचस्पी सियासत को दरकिनार कर सोनू सूद के नक्शे कदम पर चलने में दिखाती तो शायद कुछ गरीब मजदूरों की और मदद की जा सकती थी उन मजदूरों को बचाया जा सकता था जो भूख-प्यास से रास्ते में ही मर गए मगर सोनू सूद जैसे सच्चे राष्ट्रभक्त ने बिना किसी सियासत व भेदभाव के वह करके दिखाया जो एक सच्चे देशभक्त को करना चाहिए। उनके इस निःस्वार्थ भाव की सेवा ने उन्हें सुपर हीरो का तमगा दिया है तो कृपया इन पर सियासत बंद करें और उनका अनुसरण करें।

रचनाकार :- मिथलेश सिंह 'मिलिंद'