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परोक्ष रूप में ही सही अस्पृश्यता को भी बढ़ा रहा कोरोना
May 23, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख

जहाँ भारत में अस्पृश्यता की प्रथा को अनुच्छेद १७ के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है। अनुच्छेद १७ यह कहता है कि अस्पृश्यता का अन्त किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। अस्पृश्यता से उपजी किसी भी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।
मगर कोरोना की वजह से आज वही अस्पृश्यता अर्थात छुआछूत अप्रत्यक्ष ही सही समाज में फिर से धीरे-धीरे अपना पाँव पसार रहा है। अस्पृश्यता किसी भी सुसभ्य और सुसंस्कृत समाज की सुदृढ़ नींव को ही हिला देता है। परिणामतः मानवता के समूल का पतन स्वाभाविक है। जो मानव समाज के लिए एक कलंक होगा। डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार अस्पृश्यता सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक व मानसिक लगभग हर क्षेत्र में आज भी मौजूद है जो मानवीय मानवता को दीमक की तरह चाट रहा है। एक सुदृढ़ समाज की रचना हेतु इसका खात्मा जरूरी है।
मगर आज परिस्थितियां विषम हैं कोरोना रूपी वैश्विक महामारी ने आज अस्पृश्यता की परिभाषा को भी बदल दिया है। जो छुआछूत भारतीय संविधान में दंडनीय अपराध घोषित है इस कोरोना महामारी के कारण उसी को सोशल डिस्टैंसिंग के रूप में अनिवार्य रूप से वैध करार दिया गया है। और इसका पालन न करने पर दंड का प्रावधान रखा गया है। जो परिस्थितियों को देखते हुए जायज भी है। इस कोरोना महामारी से बचने के लिए पूरी दुनिया इसी एक मात्र उपाय को अपनाने पर विवश है।
आज के इस कोरोना काल ने परोक्ष ही सही मगर हकीकत में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अस्पृश्यता को भी बढ़ावा दिया है। कहा जाता है कि अस्पृश्यता यानी छुआछूत सामाजिक तौर पर अप्रत्यक्षतः शुरू होकर धीरे-धीरे मानसिकता में समाहित हो जाता है और आगे चलकर एक आनुवांशिक लक्षण के रूप में विकसित होने लगता है। जो मानवीय समाज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
सच तो यह है कि कोरोना महामारी ने मानव के सामाजिक और मानसिक दोनों रूपों पर अपना लगभग पूर्ण पकड़ बना लिया है इससे बचाव के लिए सरकारों ने लॉकडाउन और सोशल डिस्टैंसिंग का नियम पारित किया जिसके चलते परोक्ष रूप में ही सही मानवीय समाज की परिभाषा में बदलाव देखा जा सकता है। आशंका है कि यह जो अस्पृश्यता की कुरीति छिपे तौर पर मौजूद थी वह अब खुले तौर पर सामने है वह कहीं न कहीं अस्पृश्यता को बढ़ावा देने में कारगर होगी जिसका मूल कारण कोरोना नामक महामारी ही है।
वैज्ञानिक युग में जो अस्पृश्यता काफी हद तक कम हो चुकी थी लोग आधुनिकता में ही सही अर्थात् दिखावे में ही सही एक-दूसरे से मिलते थे मगर अब वह झिझक कोरोना ने पूरी तरह से खतम कर दी लोग सामने वाले को कोरोना का हवाला देकर दूर रहने की सलाह देने लगे हैं। कारण भले ही कोरोना हो मगर समाज में आज भी यह अस्पृश्यता कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में विद्यमान है जिसे बाहर लाने का काम कोरोना कर रहा है। हम आधुनिक युग में पदार्पण तो कर चुके हैं लेकिन शायद हम अभी भी आधुनिक नहीं बन पाएं हैं। जिसके चलते कोरोना महामारी ने परोक्ष ही सही अस्पृश्यता को उजागर किया है। जो सोशल डिस्टैंसिंग हम कोरोना से बचाव के लिए फॉलो कर रहे हैं वह इस परिस्थिति के अनुसार अत्यन्त आवश्यक है परंतु इसे अस्पृश्यता स्वरूप मानसिक न होने दें! अन्यथा हम कभी न कभी इस कोरोना महामारी से उबर ही जाएंगे पर इस अस्पृश्यता जैसी घातक बीमारी से उबरना शायद बेहद ही मुश्किल होगा।

रचनाकार :- मिथलेश सिंह 'मिलिंद'