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मज़बूर मानव
May 31, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
कैसी विपदा आन पड़ी है
अपने हुए परायें हैं
कल तक जो अपना कहते थे
सब तो हमको विसराये है।
      इतने वर्षों से जो कमाया था
      वो रिश्ते भी काम मे न आये हैं
     जो कहते थे उनका ख़ास हूँ मैं
     सब वादे उनके झूठे झुठाये हैं।
महामारी कैसे आ गयी है अब
शहर से पैदल चलना है
नंगे पांव में पड़े है छाले
भूखे प्यासे रहना है। 
        प्रकृति के खेल के आगे देखो
        मानव कितना मजबूर है
        कितनी तेजी कर ले विज्ञान अभी
        कुदरत के राज़ों से बहुत दूर है।