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लॉकडाउन में बदलती जीवन शैली
May 29, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
प्रकृति परिवर्तनशील है।समय-समय पर प्रकृति का रूप बदलता रहता है।मौसम बदलते रहते हैं,रितुयें बदलती रहती हैं।इन्हीं के साथ प्रकृति का रंग,रूप,दृश्य एवं प्रभाव भी बदलते रहतें हैं।वास्तव में परिवर्तन संसार और सृष्टि का आवश्यक विधान है।
मनुष्य ने भी परिवर्तन की उपयोगिता और आवश्यकता को समय एवं परिस्थितियों के साथ बदलना प्रकृति से ही सीखा है।मनुष्य ने ही नहीं संसार के प्रत्येक प्राणी ने यह कला प्रकृति से ही सीखी है।या यूँ कहें कि कुछ प्राणियों में परिवर्तन की कला उनकी जन्मजात प्रवृति ही होती है।जैसे गिरगिट का परिस्थितियों एवं समयानुसार रंग बदलने की कला जन्मजात है,प्रकृति प्रदत्त है।कुछ प्राणियों में यह कला जन्मजाक होती है तोकुछ में आवश्यकतानुसार आ जाती है।अब कछुये को ही देखिये।उसे जब भी कोई खतरा समझ में आता है तो वह अपने आप को संकुचित करके एक सुरक्षा कवच के अन्दर कर लेता है।अपना रूप,रंग और आकार बदल लेता है।
आज मनुष्य की भी यही स्थिति हो गई है।इस वैश्विक महामारी में कोरोना के  प्रकोप से बचने के लिये मनुष्य भी कछुये की भांति लॉकडाउन में घर के अन्दर सुरक्षा कवच में सिमट गया है।यही इस समय काल और परिस्थिति के अनुसार उसके लिये कल्याणकारी एवं लाभप्रद है।ऐसा करके जहाँ वह स्वयं अपने परिवार के साथ सुरक्षित रहता है वहीं दूसरों को भी सुरक्षित रखता है।
लॉकडाउन में मनुष्य की जीवन शैली में भी बहुत तेजी से बदलाव आया है।उसकी दैनिक चर्या बिल्कुल बदल गई है।सोने,जागने,खाने,पीने,नहाने,धोने के समय में भी बदलाव आया है।उसकी पूर्व की सुनिश्चित एवं व्यवस्थित जीवन शैली क्षत-विक्षत हो गई है।लॉकडाउन के पूर्व व्यक्ति अपने सुनियोजित कार्यक्रम के अनुसार अपनी दिन चर्या व्यवस्थित किये था।वह अपने कार्य में लगा था।उसका हर कार्य निश्चित समय पर होता था।किन्तु लॉकडाउन में पूर्व की सारी व्यवस्थाएं एवं परिस्थितियाँ बदल गई हैं।
लॉकडाउन के चलते लोगों के विचार बदले हैं,भावनाएँ बदली हैं,अभिवादन के तरीके बदले हैं,सम्बन्धों के निर्वहन के तरीके बदले हैं।जो समय की दृष्टि से उचित एवं आवश्यक है।
पहले हम हाथ मिलाकर,गले लगाकर,हृदय से लगकर या पैर छूकर (छोटे होने की दशा में) अपने हृदय के प्रेम,स्नेह और आदर तथा सम्मान को प्रदर्शित करते थे।किन्तु अब उनके परिवर्तन की आवश्यकता है।बदलाव समय की मांग है।हम भले ही पूर्व की भांति अपना स्नेह,प्रेम,आदर एवं सम्मान प्रकट नहीं कर पा रहे हैं किन्तु हृदय में तो वह भाव पूर्व की भांति आज भी हैं।बस हम उन्हें शारीरिक निकटता से प्रदरशित न करके केवल अपनी भावनाओं के द्वारा प्रकट कर रहे हैं।
पूर्व में हम महिलाओं को दुपट्टे से चेहरा ढँके हुये तथा हाथों में गिलप्स पहने पहने सामान्य रूप से देखते थे।ऐसा वे त्वचा की सुरक्षा,धूप के बचाव एवं अनेक प्रकार की त्वचा सम्बन्धी समस्याओं से बचने के लिये करती थीं।आज समय बदला है,परिस्थितियाँ बदली हैं।त्वचा की सुरक्षा के साथ-साथ उनका यह पहनावा कोरोना के बचाव के लिये भी आवश्यक हो गया है।महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों में भी मुँह ढँकना और गिलप्स पहनना सामान्य रूप से आवश्यक एवं लाभ दायक हो गया है।
शादी,विवाह के तौर तरीके,उत्सव,तीज त्योहार,पूजा पद्धतियाँ एवं लोकाचार और व्यवहार आदि के मानक और तरीके बदल गये हैं।
लॉकडाउन में इस बदलती हुई जीवन शैली से जहाँ कोरोना से बचाव लक्षित हुआ है वहीं इससे अनेक प्रकार की सामाजिक एवं पारिवारिक विषमतायें तथा विद्रूपतायें भी उभर कर सामने आई हैं।