ALL उत्तर प्रदेश बिहार मध्य प्रदेश लेख कहानी कविता अन्य खबरें न्युज
कोरोना में कलाकार
July 6, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
एक सामान्य नागरिक की तरह एक व्यक्ति, जो ‘कलाकार‘ भी हो सकता है, के जीवन-यापन और रोजगार की स्थितियों पर सहानुभूति सहित विचार करने का प्रयास करें तो कुछ बातें ध्यान में आती हैं (संभव है स्वाभिमानी कलाकारों को किसी की ‘सहानुभूति‘ की आवश्यकता न हो, फिर भी यहां उनकी स्थितियों पर तत्वतः विचार का प्रयास है) अपने संपर्क के कलाकारों, खासकर प्रदर्शनकारी कलाओं से जुड़े कलाकार और जिनमें साहित्यकारों को भी शामिल कर लिया जाय तो उनकी आवाज आपको अधिक सुनाई पड़ेगी, क्योंकि इस वर्ग की अभिव्यक्तियां अन्य की तुलना में अधिक मुखर होती हैं और उनके लिए मंच भी होता है।
ऐसे बहुतेरे कलाकार हैं जो वेतनभोगी हैं, जिनके आय का नियमित साधन है। ऐसे भी कलाकार होते हैं, जो अपनी कला के माध्यम से कोई आय उपार्जन नहीं करते, जिनमें रामधुन आदि की प्रभात-फेरी निकालने वाले, आल्हा गाने वाले, खेत-खार में ददरिया गाते, बंसी बजाने वाले और नवरात्रि के दौरान मांदर बजाने वाले, माता सेवा के गीत गाने वाले अनगिन अनाम कलाकार हैं। निसंदेह, ऐसे भी कलाकार हैं जिनका जीवन-यापन, पेशा, आजीविका का एकमात्र/मुख्य साधन कलाकारी है। यह भी याद रखना और दुहराया जाना जरूरी है कि कला-साहित्य का क्षेत्र सरस्वती की साधना है और सरस्वती-लक्ष्मी का बैर बताया जाता है। आशय यह कि बहुत सीमित, बल्कि ऐसे कलाकारों-साहित्यकारों का प्रतिशत नगण्य होगा, जिनका आसानी से गुजारा कला-साहित्य के आसरे हो जाता है।
यों तो कलाकारों की मदद के लिए सरकारी योजनाएं और प्रावधान हैं, लेकिन अप्रत्याशित विपरीत परिस्थितियों में दैनंदिन आवश्यकताओं की पूर्ति में न सिर्फ कलाकार, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ अलग किस्म की अड़चनें सामने आती हैं। कोरोना के इस दौर में कलाकारों की मदद के लिए जिज्ञासा की जा रही है। विचाारणीय है कि संकट काल में जीवन की तात्कालिक और आकस्मिक बुनियादी जरूरतों और उनके प्रति मदद के लिए लिंग, जाति, वर्ग, धर्म या अन्य किसी आधार पर वर्गीकरण किया जाना न तो आसान होगा, न व्यावहारिक इसलिए गैर-जरूरी भी। इन बातों के साथ मेरी जानकारी में, परिस्थितियों से मजबूर ऐसे जरूरतमंद, जिनके दैनंदिन जीवन के लिए आवश्यक ‘रोटी-कपड़ा-मकान‘ की कोई व्यवस्था नहीं है, उनके साथ बिना भेदभाव के शासन-प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं और निजी स्तर पर भी सहयोग के लिए हाथ आगे आए हैं। हम में ऐसे हैं जो अपनी रोजाना की जरूरत पूरी कर पा रहे हैं, बल्कि अन्य की मदद कर सकने की स्थिति में भी हैं। यह ध्यान रहे कि हम किसी के प्रति कुछ कर रहे हैं तो सब से पहले अपनी तसल्ली, अपने मन के संतोष के लिए कर रहे हैं और जिसके लिए कर रहे हैं, वह उसके प्रति उपकार नहीं, क्योंकि वह हमारी संतुष्टि के लिए निमित्त-मात्र है। अपने योगदान के लिए अपनी सीमा में आवश्यक सावधानी रखते हुए यथासंभव अपने आसपास, ऐसे जरूरतमंद, जो आपकी प्राथमिकता में हो, मदद के लिए पहल करें, प्रेरित करें
इस दौर में हम सभी, विशेषकर ऐसे विचारवान जो अभिव्यक्ति के माध्यमों से जुड़े हैं, अपनी नागरिक जिम्मेदारी सहित अपने प्रश्न, संदेह और असंतोष के साथ, उनके हल की ओर सक्रिय और अग्रसर होकर, उस पर विजय पाने का प्रयास करें।
 
प्रफुल्ल सिंह