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किस कौम से तुम सब आते हो
May 18, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
धर्म-धर्म करते रहते हो
उस धर्म को ना पढ़ पाते हो
ईर्ष्या और द्वेष को मन में लिए
किस कौम से तुम सब आते हो।।
 
टीपू सुल्तान,कलाम, मोहम्मद
इन सबको नहीं पढ़ाते हो
पत्थरबाजी किसपर करना है
ये सब कैसे सिखलाते हो।।
 
करतूत कर रहे हो तुम सब
मज़हब बदनाम कराते हो
अल्लाह भी पूछते हैं तुमसे
किस कौम से तुम सब आते हो।।
 
रिश्तों को खत्म कर सको तुम
ऐसी कुछ आग लगाते हो
भाईचारा ना बढ़ा सके
नफ़रत की कौम बनाते हो।।
 
मानवता खत्म हो रही है
तुम नीच  कृत्य कर जाते हो
मज़हब के और भी बंधू हैं
उनको बदनाम कराते हो।।
 
हिन्दू मुस्लिम कर डाले हो
दोनों को अलग बताते हो
मज़हब के नाम के ईटों को
डॉक्टरों पे तुम फिकवाते हो।।
 
सीधी-साधी जनता को तुम
ज़ाहिल कैसे बनवाते हो
मानवता का तुम गला घोटने
किस कौम से तुम सब आते हो।।
 
इस देश की सीधी जनता में
नफ़रत की आग फैलाते हो
नफ़रत फैलाने वालों तुम
किस कौम से तुम सब आते हो।।