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कलयुग की कारामात
May 25, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
कहते गंगा मैली हो गई
उसी में धोते पाप है
अपनों पर जो छूरी चलाते
प्रभु का करते जाप है
कभी जो नेकी कर के देखो
बदी मिले सौगात है
देखो भैया कैसे करता
कलयुग अब कारामात है
बने मसीहा मजदूरों के
नही जो पकड़े कभी हथौड़ा
उन को मिलता सूखी रोटी
खुद को खाएं तला पकौड़ा
भिखमंगो के नेताजी पर
नोटों की बरसात है
देखो भैया कैसे करता
कलयुग अब कारामात है
बात जो करता धर्म न्याय की
अता पता नही रहता उसका
कीमत थोड़ी कम ज्यादा है
बिकता है ईमान सभी का
हम जो प्रश्न उठाए इन पे
अपनी क्या औकात है
देखो भैया कैसे करता
कलयुग अब कारामात है
मधुकर वनमाली