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कैकेयी के दो वरदान"
May 28, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख

वाल्मिकी रामायण में उल्लेख मिलता है कि विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम का जन्म चैत्र माह, शुक्ल नवमी के दिन अयोध्या में हुआ था।वे रघुकुल के बहुत पराक्रमी और तेजस्वी राजा थे और उनका प्रताप अत्यधिक था जिसकी वजह से इस वंश का नाम रघुवंश पड़ा।मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श, उनका त्याग हमारे जीवन में प्रेरणा स्त्रोत है।
                                    जैसा कि सबको विदित है,अल्प काल में विद्या ग्रहण करने के पश्चात चारो राजकुमारों का सकुशल विवाह संपन्न हुआ,और नियमानुसार राजा राम जी के राज्यतिलक की तैयारी होने लगी।परन्तु मन्थरा दासी के बहकावे में आकर माता कैकेयी ने देवासुर संग्राम में राजा दशरथ की रक्षा के फलस्वरूप जो वरदान पाया था उसे मांग लिया,जिसमें भरत को राजगद्दी और राम जी को चौदह वर्ष का वनवास।
                                  चूंकि महाराज दशरथ रघुकुल वंश के थे अतः उन्हें ये वरदान ना चाहते हुए भी देने पड़े।जिसका परिणाम ये हुआ कि राम जी ने भाई लक्ष्मण और पत्नी "सीता" संग वन को चले गए।अब प्रश्न ये उठता है कि माता कैकेयी का वरदान मांगना उचित था या अनुचित?अगर इस पर विचार किया जाय तो परिणाम ये निकलता है कि उनका वरदान मांगना उचित था क्योंकि माता कैकेयी अगर वरदान ना मांगती तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम, किसी साधारण राजा की भांति ही प्रतीत होते।कैकेयी के बगैर रामायण की कहानी सदियों तक अमर रहती भी या नहीं ये भी नही कहा जा सकता। और ये तो सर्वविदित है कि जिसने भी कष्ट उठाए हैं,वो पूरे जग में विख्यात हो गया है।राम जी ने चौदह वर्ष वन में अनेक कठिनाइयों में व्यतीत किये।और द्वापर से आज कलियुग में भी राम जी की सत्यता,कर्तव्यनिष्ठा,वचनबद्धता का गुणगान हो रहा है,और अनन्त काल तक होता रहेगा।तुलसीदासजी ने भी कहा है-"सिया राम मय सब जग जानी।"