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जीवन के साथ जीविका भी
June 3, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
जब से इंसानियत की शुरुआत हुई तभी से हमारा सामना महामारियों से होता आ रहा है । हर महामारी के बाद इंसानी सभ्यता ज्यादा मजबूत होकर उभरी है ।शुरुआत के दौर में तो हम स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से बहुत कच्चे थे, परंतु इंसानों ने अपनी सुझबूझ  और जिजीविषा से हर महामारी को मात दी । कुछ नुकसान जरुर हुआ , लेकिन उनकी काट खोज कर हमनें उन्हें मृतप्राय कर दिया । कोरोना भी इससे अलहदा नहीं होगा । हमें सिर्फ साहस की कोशिश और नजरिये की आवश्यकता है । पहले लाॅकडाउन से चौथे लाॅकडाउन तक देखा जाए तो सिर्फ और सिर्फ एक ही चीज समान पाएंगे-- भय  । हर तरफ , हर आदमी डरा हुआ है, क्या ये डर कोरोना के इलाज की दवा है ? हम ऐसे दुश्मन से लड़ रहे हैं जिसे जानते ही हैं , हमारे पास लड़ने का कोई हथियार भी नहीं है  । अगर अपनी पुराण गाथाओं में खोज करते हैं तो आपको ऐसे युद्घ कौशल की जानकारी मिलेगी जो हथियारों के बिना लड़ी जाती थी । वह समस्त ज्ञान को एकत्रित कर लड़ी जाने वाली लड़ाई थी, डरना नहीं,साहसी बनना । सावधानी के साथ बाहर निकालना ,  सारी हिदायतों का पालन करते हुए अपना काम करना, ईमानदार और उदार बनना कोरोन से लड़ने वाले सिपाही की पहचान है ।
कोरोना के सिपाही कई प्रकार के लोग हैं -- जैसे एक सिपाही वह है जो अस्पतालों में रात - दिन बिमारी से जुझारू है । वह ईमानदारी से आपना कार्य करता है , दुसरा जो दूर खेतों - खलिहानों में , फुल - फलों के बगीचों में , छोटे - बड़े उद्योगों में  लगातार मेहनत कर उत्पादन की श्रृंखला को टूटने नहीं दे रहा है । तृतीय सिपाही वह है जो सिपाही के वस्त्रों में हर सड़क के चौराहे पर खड़ा मिलता है और  वाह हमें रोकता है, निषेध करता है , कभी मुँह से तो कभी डन्डे  से बात करता है, जब वह डन्डे से बात करता है  तो  वह हारा हुआ  , अकुशल सिपाही होता है  लेकिन उसे हम देखकर उन अनगिनत सिपाहियों को नजरअंदाज कैसे कर सकते हैं , जो हर लाॅकडाउन में न लाॅक होते हैं  और न डाउन होते हैं ? चौथा सिपाही वह है जो अपनी प्रेरणा से अपनी चोटी मुट्ठी में  बड़ा संकल्प बान्धकर  खाना - पीना - मास्क - ग्लव्स लेकर कभी यहाँ  तो कभी वहाँ स्वप्रेरणा से भागता दिखाई देता है । पांचवा सिपाही वह है  जो सा
सहानुभुतिपूर्वक हर किसी की तकलीफ सुन रहा है और सद्भावपूर्वक उसे सही मार्गदर्शनकर रहा है । गही है जो हमारे घरों - सडकों - पेड़ों पर रहने वाले बेजुबानों के लिए कहीं पानीभर देता है तो कहीं रोटी डाल देता है ।
यह है जो हमारे उस प्राचीन गणित को सही साबित करना चहता है जिससे एक और एक , दो नहीं ग्यारह होते हैं । यह गलत गणित नही है , हमारे गलत गणित को सही करने वाला शाश्वत गणित है । आप लाॅकडाउन में घरों के भीतर ही नहीं , घरों के बाहर क्या कर रहें हैं और किस नजर से कर रहे हैं  यहीं बताएगा की आप स्वयम ही कोरोना हैं  की कोरोना के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई के सिपाही हैं । प्रतिकूल हालात में यह जंग अपने  चरम सीमा की ओर अग्रसर हो रहा है । इन्सान हारता नहीं, हालात हार जाते हैं, ऐसे ही प्रतिकूल हालात कोरोना के रूप में आज हमारे सामने है । हर बदलाव बेहतरी के लिये होता है , जीवन के इस संघर्ष में इन्सान ही विजयी होगा और फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाएगा ।
इसी आशा और विश्वास के साथ हम इस संघर्षपूर्ण जीवन में  नित्य अग्रसर होते जा रहे हैं  । स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस से घबराने की जरुरत नहीं है । आगामी कुछ दिनों में यह समान्य फ्लू की तरह हो जाएगा और हमें इसके साथ जीवन जीने की आदत डालनी होगी साथ हीं इन आदतों को हम कुछ एहतियात कदमों के जरिए सुनिश्चित कर सकते हैं । ऐसे ही कुछ कदमों में   *ई - मिटिंग , शारिरीक दुरी, घर का खाना , अपशिष्ट पदार्थ का जिम्मेदारी से निस्तारण, ऑफिस में ज्यादा अन्दर - बाहर न करना  , एक  - दुसरे से 6 फीट की दुरी , हर समय मास्क का प्रयोग , किसी भी सतह को छूने पर अपने हाथों को सैनीटाइज करें , अपने हाथ को 20 सेकेंड तक धोते रहें  इत्यादि* आता है  । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में विभिन्न बिमारियों और वजहों ( कोरोना से अलग ) से रोजाना डेढ़ लाख मौतें होती हैं । अकेले सिर्फ भारत में ऐसी मौतों का आंकड़ा 25 हजार है । ये भयावह तस्वीर हमें बताती है कि कोरोना से डरना नहीं , हमें लड़ना है  ।  जहां तक कुछ विशेषज्ञ यह दावा क्र रहे हैं कि  भारत में अभी पीक आना बकी है  तो वह वायरोलाॅजी के बारे में जानते नहीं । बतौर विशेषज्ञ वाह अपनी राय दे रहे हैं । मेरा मानना है कि भारत में ना पीक  आया है  और न आएगा । अगले माह तक इसमें अवश्य कमी आएगी । प्रकृति  में  कोई चीज स्थायी नहीं होती  । इंसानी सभ्यता की शुरुआत से महमारियां आ रही हैं  और  खत्म भी हुईं हैं  ।इसी तरह से कोरोना भी जल्द खत्म हो जाएगा ।
लड़ने का समय है , जीतने का समय है क्योंकी जीवन एक संघर्ष है और वर्तमान घटनाओं को देखते हुए हमें  सतर्कता से अपने काम को करते हुए इस महामारी पर भी विजय प्राप्त कर लेना है ।
विजय तभी प्राप्त होती है जब हम असली मोर्चे पर अपने दम - खम के साथ डटे रहें, इसलिए मै एक बार फिर कहूँगा की लड़ने का समय है, हारने का नहीं - जितने का समय है ।