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दिव्यांगों एवं वृद्धों की सामाजिक सुरक्षा योजना 
September 15, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
देश के कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए भारत सरकार ने नागरिकों के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज के साथ आत्मनिर्भर भारत अभियान शुरू किया है| इस पैकेज के माध्यम से सरकार ने समाज के अलग-अलग वर्गों की सहायता का प्रयास किया है। उद्यमियों, कारोबारियों, श्रमिकों और विभिन्न सामाजिक वर्गों की सहायता करने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन का सभी वर्गों पर प्रभाव पड़ा था। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत सरकार ने 1.70 लाख करोड़ रुपये के जिस आर्थिक पैकेज की घोषणा की, उसमें गरीबों, मजदूरी करने वाली महिलाओं, शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना कर रहे व्यक्तियों और वृद्धों के लिए अलग से व्यवस्थाएं की गई हैं। ये योजनाएं विभिन्न कार्यक्रमों का हिस्सा हैं। इनमें केंद्र और राज्यों की योजनाएं भी शामिल हैं।
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के तहत असहाय व्यक्तियों का सहारा भी राज्य है। बेशक उन्हें सामाजिक संस्थाएं और निजी तौर पर अपेक्षाकृत सबल व्यक्ति कमजोरों, वंचितों और हाशिए पर जा चुके लोगों की सहायता के लिए आगे आते हैं, पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी राज्य की होती है। हमारे संविधान का अनुच्छेद 41 कहता है, ‘राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।’ इसके साथ अनुच्छेद 42 और 43 भी सामाजिक वर्गों की सहायता के लिए राज्य की भूमिका की ओर इशारा करते हैं।
सहायता पाने वालों में गरीब और वृद्ध विधवाएं भी शामिल हैं, जिनका कोई सहारा नहीं है। यह लाभ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से दिया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत लाभ उठाने वाले करीब तीन करोड़ लाभार्थी हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत लाभ पाने वाले करीब 30 करोड़ लाभार्थियों की तुलना में यह संख्या छोटी है, पर बहुत महत्वपूर्ण है। समाज के इस वर्ग को सबसे असहाय मानना चाहिए। इनके लिए ही भारत सरकार का राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) बनाया गया है। यह कार्यक्रम अभावों से जूझ रहे व्यक्तियों और उनके परिवारों तक नकद हस्तांतरण की सुविधा, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा समेत समग्र सामाजिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग है।
वृद्धों से संबंधित कार्यों का संचालन करने वाले स्वैच्छिक संगठनों को सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के एक कार्यक्रम के तहत सहायता दी जाती है। इसमें वृद्धों के लिए डे-केयर चलाने और उनके रखरखाव के लिए परियोजना लागत के 90 प्रतिशत तक की सहायता दी जाती है। 
मध्य वर्ग के वरिष्ठ नागरिकों के कार्यक्रमों से ज्यादा महत्वपूर्ण गरीब बुजुर्गों के कार्यक्रम हैं, पर उसके पहले राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) का जिक्र करना बेहतर होगा। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा प्रशासित राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को हुई थी। इसका क्रियान्वयन शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में किया जा रहा है। वर्ष 2016 में एनएसएपी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण योजना (कोर ऑफ़ कोर) के तहत लाने का जबसे रणनीतिक फैसला किया गया है, तब से केन्द्र सरकार योजना की शत-प्रतिशत जरूरतें पूरी करने के लिए वित्तीय प्रतिबद्धता को लगातार बढ़ा रही है। 
पेंशन योजना के आवेदक को गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार से संबंधित होना चाहिए। इस योजना के अलावा अन्नपूर्णा योजना भी है, जिसमें वरिष्ठ नागरिकों को 10 किलो अनाज प्रतिमाह दिया जाता है। वस्तुतः यह योजना उन नागरिकों के लिए है, जो आईजीएनओएपीएस के पात्र तो हैं, पर जिन्हें वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल रही है। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (आईजीएनडब्लूएनपीएस) है। इसके अंतर्गत गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली 40-79 वर्ष आयु की विधवा स्त्रियों को प्रति माह 300 रुपये की सहायता दी जाती है। जब वे 80 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेती हैं, तो उन्हें आईजीएनओएपीएस में शामिल कर लिया जाता है, ताकि वे 500 रुपये प्रतिमाह की सहायता प्राप्त कर सकें। 
उच्च शिक्षा, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, भूमि के आवंटन में आरक्षण, गरीबी उन्मूलन योजना आदि जैसे अतिरिक्त लाभ दिव्यांग व्यक्तियों और असहाय व्यक्तियों के लिए प्रदान किए गए हैं। बेंचमार्क विकलांगता वाले कुछ व्यक्तियों या वर्ग के लोगों के लिए सरकारी प्रतिष्ठानों में रिक्तियों में आरक्षण 3 से बढ़ाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया है। इन्हीं कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री सुगम्य भारत अभियान भी शामिल है, जो दिव्यांग व्यक्तियों की सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करने के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के विकलांगजन सशक्तीकरण विभाग द्वारा शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों को जीवन के सभी क्षेत्रों में भागीदारी के समान अवसर एवं आत्मनिर्भर जीवन प्रदान करना है।
दिव्यांगता पर आधारित केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्ड को केंद्र और राज्य स्तर पर शीर्ष नीति बनाने वाली संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए स्थापित किया जाना है। दिव्यांग व्यक्तियों के मुख्य आयुक्त के कार्यालय को सुदृढ़ किया गया है, जिन्हें अब दो आयुक्तों और एक सलाहकार समिति द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी। इसमें दिव्यांगता से जुड़े विभिन्न विशेषज्ञ होंगे।
विकलांग व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य कोष का निर्माण किया जाएगा। विकलांगों के लिए मौजूदा राष्ट्रीय कोष और विकलांग व्यक्तियों के सशक्तीकरण के लिए ट्रस्ट फंड को राष्ट्रीय कोष के साथ सदस्यता दी जाएगी। इस कानून में ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ अपराध के लिए दंड का प्रावधान है जो दिव्यांगजन के खिलाफ अपराध करते हैं या कानून के प्रावधानों का भी उल्लंघन करते हैं। विकलांगों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों को निपटाने के लिए प्रत्येक जिले में विशेष न्यायालयों का गठन किया जाएगा।
दिव्यांगजन के अधिकारों की रक्षा के प्रावधान तो हुए हैं, पर उनके लिए संसाधन अभी पर्याप्त नहीं हैं। समिति की सिफारिशों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि दिव्यांगजन को सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए संसाधनों की व्यवस्था भी करनी होगी। दूसरी तरफ हम बजट आबंटन पर नजर डालें, तो स्पष्ट होता है कि अभी इस दिशा में काफी सुधार की जरूरत है। एनएसएपी योजना के महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों के लिए बजट का आकार यथेष्ट नहीं है।
दिव्यांगों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार की ओर से ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन कार्यक्रम (आईजीएनडीपीएस) चलाया जाता है। इस योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले 18-79 वर्ष की आयु के विविध प्रकार की निशक्तताओं से प्रभावित व्यक्तियों को प्रतिमाह 300 रुपये की सहायता दी जाती है। 80 वर्ष की आयु हो जाने पर उन्हें आईजीएनओएपीएस के तहत 500 रुपये प्रतिमाह की सहायता मिलने लगती है। अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में भी दिव्यांग लोगों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। मनरेगा के तहत कार्यस्थलों पर पेयजल उपलब्ध कराने, पालना घर की व्यवस्था इत्यादि में दिव्यांग लोगों को काम दिलाने को प्राथमिकता दी गई है। दिव्यांग मज़दूरों को अन्य मज़दूरों के बराबर ही मजदूरी दी जाती है। दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के तहत लोगों के कौशल को बढ़ाने के लक्ष्य का कम-से-कम तीन प्रतिशत कौशल विकास लक्ष्य दिव्यांगों के लिए सुनिश्चित किया जाना ज़रूरी है। प्रधानमंत्री आवास योजना में भी राज्यों के लिए प्रावधान है कि वह कम-से-कम तीन प्रतिशत दिव्यांग लाभार्थी सुनिश्चित करें।
प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
शोध प्रशिक्षक एवं साहित्यकार