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धर्मनिष्ठ तथा धर्मभीरु में अंतर
September 18, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
धर्मनिष्ठ वह होता है जो श्रद्धा से धर्म को मानता है। जबकि धर्मभीरु का मतलब धर्म से डरने वाला होता है। धर्मभीरु भयवश धर्म को मानता है।
         धर्मनिष्ठ व्यक्ति धर्म के असली अर्थ और महत्व को भलीभांति जानता और समझता है, किंतु धर्मभीरु व्यक्ति धर्म के अर्थ और महत्व को समझे बिना ही धर्म का पालन करता है।
         धर्मनिष्ठ व्यक्ति मानवता के पालन को ही सबसे बड़ा धर्म मानता है। करुणा, क्षमा, सत्यवादन, चोरी न करना, अहिंसा, किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट न देना, दूसरों की सहायता करना, माता-पिता एवं गुरुजनों का आदर करना आदि मानवीय गुण और जीवन के मूलभूत सिद्धांत, धर्मनिष्ठ व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र में निहित होते हैं। किंतु धर्मभीरु व्यक्ति धार्मिक-आध्यात्मिक पुस्तकों और गुरुजनों द्वारा भयभीत कराए जाने के कारण इन मानवीय गुणों और जीवन के मूलभूत सिद्धांतों का भयवश अनुपालन करता है।
          शायद ऐसे लोगों के लिए ही नर्क आदि लोकों की कल्पना की गई है और धार्मिक पुस्तकों में भांति-भांति के नर्कों और उनकी भांति-भांति की यातनाओं का वर्णन कर, ऐसे व्यक्तियों को धर्म के मार्ग पर चलाने का प्रयास किया गया है। अच्छे-बुरे कर्मों को पाप-पुण्य की श्रेणी में बांटने और स्वर्ग-नरक जाने की अवधारणा भी इन्हीं धर्मभीरु व्यक्तियों के कारण संभव हुई है।
         संत-महात्माओं के द्वारा दिए गए उपदेशों को एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति श्रद्धा से सुनता है, प्रशन्नचित्त होकर उनके द्वारा बताई हुई अच्छी और प्रेरणादायक बातों का चिंतन-मनन करता है और उनको अपने जीवन में निर्भीकता से उतारता है। किंतु धर्मभीरु व्यक्ति इन उपदेशों और उनके द्वारा बताई हुई अच्छी और प्रेरणादायक बातों का अनुपालन भयवश और स्वर्ग आदि प्राप्त करने के लालच में करता है। इसीलिए जनसामान्य में लोक-परलोक की चिंता रहती है।
          धर्मनिष्ठ व्यक्ति निस्वार्थ भाव से कर्तव्य का पालन करता है। किंतु धर्मभीरु व्यक्ति के प्रत्येक कर्म में स्वार्थ की भावना निहित होती है, वह धर्म का पालन अपने पुण्य कर्मों के खाते को बढ़ाने के लिए ही करता है। किंतु ऐसी भावना के कारण कभी-कभी वह जिन्हें पुण्य कर्म समझकर करता है, अनजाने में वही उसके पाप कर्म बन जाते हैं।
ऐसे लोगों के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है--
 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।
 
इसका तात्पर्य यही है कि व्यक्ति को धर्मनिष्ठ होते हुए बिना कर्मफल की इच्छा के अपने कर्तव्य का पालन करते रहना चाहिए। उसे धर्मभीरु बनकर अच्छे कर्मों यानी पुण्य कर्मों के फलस्वरूप मिलने वाले स्वर्ग आदि लोकों के लालच में धर्म का पालन नहीं करना चाहिए।
      अतः स्पष्ट है कि व्यक्ति को धर्मनिष्ठ होना चाहिए न कि धर्मभीरु।
 
रंजना मिश्रा ©️®️
कानपुर, उत्तर प्रदेश