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दहेज़
May 31, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
दहेज़ के नाते जब उसे दी जाती थी यातनाएं
वो अपने परिवार के लिए ख़ामोशी से सब सहती
अक्सर उसके पैरों को जलाया जाता गर्म चिमटों से
भूखी प्यासी वो तड़पती रहती कई कई दिन रात
मगर कभी नहीं मांग करती अपने मायके से कुछ
वो लड़की है वो जानती है मायके की परिस्थिति
पता है बैंकों से लोन लेकर की गई है उसकी शादी
दर्द,प्रताड़ना को रोज़ सहती लेकिन ख़ामोश रहती
एक दिन ससुराल वालों ने मिट्टी का तेल डाल 
जला दिया उस बहू को जिसके हृदय में लक्ष्मी बसती थी
तड़प और प्यास से वो चिल्लाती रही पापा भैया मां
मगर दहेज के लोभी उसे जलता देख हंसते रहे
 बेटी को मुखाग्नि देते वक़्त पिता ने बस यहीं कहा
"बेटी नहीं होती पराया धन,बेटी तुझे न्याय दिलाऊंगा"
न्याय के देवी ने आंखों में फ़िर बांध लिया काली पट्टी
स्वतंत्र हो कर घूमने लगे उसके ससुराल वाले 
मगर पिता ने वादा पूरा किया उन्हें सजा दिलवाया
मुकदमें के लिए मां ने बेच दी मंगलसूत्र भाई ने छोड़ दी पढ़ाई
आख़िर में पिता की ये बात सच निकली
"बेटी नहीं होती पराया धन,बेटी तुझे न्याय दिलाऊंगा"