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दहेज
June 10, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता

ये देख के शैतान शर्मसार हो गया

रिश्तों का भी बंधन अब बाजार हो गया
 
रुप, गुण और शिक्षा की नहीं पूछ कोई अब
दहेज ही हर शादी का आधार हो गया
 
जब भी परिणयों के अब जुडा़व होते हैं
वस्तु की तरह रोज मोलभाव होते हैं
 
दिल तो लड़केवालों के खिल से है जाते
लड़की वालों के दिलों पर घाव होते हैं
 
रावण को जलाने में रहे व्यस्त वर्षों से
दानव दहेजलोभी का अवतार हो गया
 
शादी की खुशियां सारे इससे गम ही लगते हैं
लड़की के सारे गुण उन्हें मद्धम ही लगते हैं
 
संतोष का न भाव होता उनके दिलों में
जितना भी दे दो फिर भी उनको कम ही लगते हैं
 
सदबुद्धियों की जग में हुई है कमी बहुत 
कुरीति कुप्रथाओं का संचार हो गया