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बुजुर्ग परिवार के आधारशिला होते हैं
June 16, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • कविता
बुजुर्ग परिवार के आधारशिला होते हैं। सभी को उनके जीवनकाल के अनुभवजन्य ज्ञान का प्रत्यक्ष लाभ उठाना चाहिए। घर के बुजुर्ग छायादार वृक्ष की तरह अपने अनुभवों के मधुर फल से उपकृत करते हैं। अपनी उपस्थिति की घनी छाया से परिवार की हर पीढ़ी को कृतार्थ करते हैं। अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों की धाती आने पीढ़ियों को सौंपते समय वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
          बुजुर्गों की आवश्यकता मनुष्य को हर कदम पर पड़ती है। इस विषय में एक दृष्टान्त याद आ रहा है। किसी समय शादी के अवसर पर दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों के समक्ष शर्त रखी कि बारात में वे किसी भी बुजुर्ग को नहीं लेकर आएँगे, केवल युवा ही आएँगे। अब लड़के वाले परेशान हो गए कि बुजुर्गों के बिना बारात कैसे सजेगी?
 तब एक अनुभवी बुजुर्ग ने उन्हें परामर्श दिया कि बारात में दिखाने के लिए सभी युवा ही जाएँ। एक बक्से में एक बुजुर्ग को बिठाकर साथ ले जाया जाए। इससे लड़की वालों की बात भी रह जाएगी और एक बुजुर्ग भी साथ मिल जाएगा।
          इस बात पर राजी होकर बारात दुल्हन के द्वार पर पहुँची। अब वहाँ शादी की रस्में होने लगीं। कुछेक रस्मों के विषय में युवा कुछ नहीं जानते थे। उस समय एक युवक ने अपने ठहरने के स्थान पर जाकर उस बुजुर्ग से सब समझ लिया। वापिस आकर जब उसने उन रस्मों को उचित रीति से निभा लिया। दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों से उन रस्मों को ठीक से निभा पाने के विषय में पूछा।
        उस समय उन्होंने ने बताया कि वे एक बुजुर्ग को सबकी नजरों से बचाकर बक्से में छुपाकर लाए हैं। तब सब स्पष्ट हो गया। इसका अर्थ यही है कि युवा कितने भी योग्य क्यों न हो जाएँ, परन्तु बुजुर्गों से अधिक निपुण नहीं हो सकते। अत: बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लौहा युवावर्ग को मानना चाहिए।
          बजुर्ग परिवार में नमक की तरह होते हैं। यदि मीठे की तरह उन्हें कहेंगे, तो उचित नहीं होगा क्योंकि मीठे से मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है। मीठे खाद्यान्न कितने ही स्वादिष्ट क्यों न हों, उनसे मन जल्दी भर जाता है। नमक से वह कभी नहीं ऊबता। नमक से भोजन का स्वाद बढ़ता है, वैसे ही बजुर्गों से परिवार के संस्कार बढ़ते हैं।भोजन में नमक का होना जितना आवश्यक होता है, उतना ही घर में बजुर्गों का होना अनिवार्य होता है।
          माता-पिता मनुष्य के लिए भगवान का रूप होते हैं। जीवन पर्यन्त उनकी सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। ईश्वर को हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते, पर वे उसके प्रतिनिधि के रूप में हमारे पास रहते हैं। जिस घर में माँ-बाप हंसते हैं अर्थात् सन्तुष्ट और खुशहाल रहते हैँ, प्रभु स्वयं ही उस घर में बसते हैं। वहाँ सुख-शान्ति की कभी कमी नहीं रहती। 
        इसके विपरीत जिस घर में उनका अपमान होता है या वे कष्ट पाते हैँ। वहाँ पर कष्ट-क्लेश अपना स्थायी निवास बना लेते हैं। मन्दिरों में जाकर पत्थर के भगवान के आगे माथा रगड़ने के स्थान पर, घर में बैठे जीवित भगवान का पूजन-अर्चन सदा ही कल्याणकारी होता है, यह सार्वभौमिक सत्य है।
 
          बुजुर्ग अपने घर-परिवार के हों अथवा कोई अन्य हों, अपने पूर्वाग्रह और अहं का त्याग करके उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। जो बुजुर्गों की अवहेलना करते हैं उन्हें ऐसा न करने का परामर्श देना चाहिए। ईश्वर से उनकी सद् बुद्धि की कामना करनी चाहिए। जब किसी के भी द्वारा दिए गए श्राप फलदायी हो सकते हैं, तो बुजुर्गों के द्वारा दिए गए आशीर्वाद भी मनुष्य के लिए निस्सन्देह फलीभूत होते है। 
 
रीमा मिश्रा"नव्या"
आसनसोल(पश्चिम बंगाल)