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बिहार में पांचवी लाकडाउन का प्रभाव और उम्मीद 
May 31, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
पिछले दो महीने से पूर्ण लाॅकडाउन को 1 जून 2020 से सोशल डिस्टेसिंग के कुछ शर्तो के साथ होटल,  रेस्टूरेन्ट,  परिवहन धार्मिक स्थल तथा माॅल को खोलने के लिए भारत सरकार द्वारा अनुमति देने की घोषणा की गयी है।यह पुरी तरह से बंद पड़ी आर्थिक गलियारो को गति देने के लिए लिया गया कदम माना जा रहा है।जबकि कोरोना संक्रमित लोगो की तादाद निरंतर बढ़ रही जो देश  में अभी तक एक लाख तीस हजार पार कर चुकी है जबकि मौत का आँकड़ा पाँच हजार के करीब पहुँच चुका है ।ऐसे में आर्थिक गलियारे का खुलना एक जोखिम तो है ही पर उससे भी कहीं ज्यादा जरूरत भी है।
आर्थिक मंदी 
बिहार पहले से ही आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है जब अचानक शराबबंदी कर एक बड़े रिवेन्यू को अचानक बंद कर दी गयी।एक तरफ बाढ़ और सूखा से तंग बिहार का सबकुछ कृषि पर आश्रित है।इसमें बाजार का बंद होना निश्चित ही आर्थिक समस्या उत्पन्न कर रहा था।
पलायन
बिहार की बड़ी आबादी दूसरे प्रदेशों में काम करती है जो इस समय बिहार में है।उनकी स्थिति को देखा जया तो सबसे ज्यादा खराब हैं ।परदेश की आमदनी शून्य हो चुकी है और यहाँ सारे काम बंद फिर उनकी जीविका के आगे गहरा संकट हैं । ऐसे में बाजार का खुलना उन लोगों को बड़ी राहत देगी। विशेषकर रिक्शा चालक, आटो चालक, रेरी वाले, फुटपाथ दुकानदार, ट्रेनो में स्टेशनो पर सामान बेचने वाले, फेरी करने वाले,  खेतिहर मजदूर,  निर्माण कार्य के मजदूर,  ईट भट्ठे के मजदूर,  सड़क के मजदूर और विभिन्न प्रकार के मैकेनिक के लिए यह एक अच्छी खबर मानी जाएगी।
कोरोना का  भय 
वही दूसरी ओर देखा जाए तो बिहार में कोरोना का ग्राफ अब तेजी से बढ़ने लगा है। ऐसे में और अधिक सावधानियाँ बरतने की जरूरत है।बिहार की चिकित्सा व्यवस्था और राज्यों के अपेक्षा लचर मानी जाती है।यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी शिक्षा की कमी है।ऐसे में यदि ग्रामीण क्षेत्रों में इसने पांव फैलाये तो हालात बिगड़ सकती है।वैसे अभी भी सबकुछ राज्य सरकार पर डिपेन्ड करता है कि वह किस प्रकार सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराती है ।प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़नेवाली है । क्योंकि यह दौर चुनौतीपूर्ण है ।
व्यवसायी की समस्या
 टूट चुकी आर्थिक चेन को पुनः पटरी पर लाना भी सरल कार्य न होगा।दो महीने के बाद पड़े बाजार और उत्पादन को काफी प्रभावित किया एक चेन जो बनी हुई थी कंपनी से डिस्ट्रीब्यूटर,  रिटेलर फिर कस्टमर वो प्रायः पुनः स्थापित कर गति लाना किसी चुनौती से कम नहीं।यह स्थिति सभी के साथ है।जिससे व्यापारी वर्ग चिन्तित है। 
वेरोगारी की समस्या बिहार में सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। विकट रूप ले चुका वेरोजगारी और भी परेशानी का सबब बना जब सारे परदेशी भी यही आकर बैठे हैं ।सरकार को भी इनकी संख्या देखकर हाथ पाँव फूलने लगे है।
बेरोजगारों का इतिहास
आज जिसे देखो वेरोजगारी पर भाषण दे सकता है लेकिन यह वेरोजगारी की शूरूआत कहाँ से हुई क्या बिहार नब्बे के दशक में वेरोजगार था या नब्बे के बाद हुआ ? 1990से 2005 के बीच सभी चीनी उद्योग बंद हुए। जुट मीले बंद हुए। वस्त्र उद्योग बंद हुए। बुनकर का पलायन आरंभ हुआ। मिथिला पेंटिग्स पर प्रभाव पडा।छोटे मझोले उद्योग बरौनी उद्योग बंद हुए।औद्योगिक वित्त निगम का हाल खस्ता हुआ। सब उन दिनों हुए जब बिहार की सत्ता समाजवादियो के हाथो में थी और तो और 1990से लेकर 2005 तक सभी तरह की बहाली बंद कर दी गयी जिससे सरकारी संस्थानो और शिक्षण संस्थानो पर बुरा प्रभाव पड़ा जो आज तक ठीक नही हो सका।
वेरोजगारी की मार सह रहा बिहार 1900 से 2020 तक इस स्थिति में  पहुँच चुकी है जिसका मंजर हमने लाक डाउन में  देखा है। आखिर इसकी जिम्मेदारी तो दोनो ही कार्यकाल के सरोकारों को ही लेनी होगी।आखिर 30 वर्षो से ऐसा क्या कारण रहे की इतने बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा और सरकारें सिर्फ विज्ञापन देकर सोती रही।यह अगर विकास की परिभाषा है तो बहुत चिन्ताजनक है।इन 30 वर्षो के दौरान बिहारी नेताओं की वेतहाशा दौलत में वृद्धि हुई है जबकि यहाँ की जनता दिन प्रतिदिन नीचे जा रहे।प्रति व्यक्ति आय आज बिहार की देश की औसत आय से भी कम है । वेरोजगार युवक को रोजगार देने का विजन क्या होगा उसका अभी तक किसी मंच से व्याख्या नही की गयी कैसे रोजगार सृजन करेंगे।बिहार बाढ से प्रवाहित होती है उसके लिए क्या योजनायें है।
समाधान की उम्मीद सरकार से
बिहार की बेहतरी के लिए सरकार को उन उपायो पर जल्द गौर करना होगा जिससे रोजगार मिल सके बंद उद्योगो के लिए सोचना होगा क्योंकि उद्योग के बिना रोजगार की कल्पना करना तथ्य से परे है ।अब पानी सर से ऊपर जा चुका है तो सरकारों की कार्यप्रणाली दुरूस्त करने की आवश्यकता है। यही जमीनी हकीकत है जिस पर कोई समीकरण लागू नही होता सिर्फ उद्योग के समीकरण से ही पलायन रूक सकता है । बिहारवासी बहुत उम्मीद के साथ सरकार की ओर देख रही है अब आने वाला वक्त ही बताएगा कि वह कितने की आशा को बरकरार रख पाती है।
                                   आशुतोष 
                                  पटना बिहार