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अन्नदाता राजनैतिक दलों का मोहरा बना हुआ है
October 8, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
कृषि बिल  को लेकर हम सभी देख रहे है कि आज  पूरे देश में माहौल गरमाया हुआ है. विपक्ष जहां एक तरफ जोरदार ढंग से प्रदर्शन कर रहा है. तो वहीं पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के किसान भी इन बिलों को  लेकर खासे आक्रामक हैं। ध्यान से देखिए आप आज कहीं ना कहीं खेती -किसानी के लिए सोच- विचार कुछ ज्यादा ही अचानक बढ़ गया है । आज सिर्फ किसान और सरकारे ही नहीं बल्कि शहरों में रह रहे नौकरीपेशा, उद्योग धंधों में लगे और सामाजिक चिंताशील लोग भी कृषि पर विमर्श करते दिख रहे हैं। इससे देश में कृषि पर संकट की तीव्रता दिखे या ना दिखे लेकिन राजनीतिक दलों के संकट कितना है यह जरूर दिख रहे,दोस्त आज आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हमारे अन्नदाता के जीवन में कोई बदलाव तो नहीं आए हैं लेकिन राजनीतिक दल अपना हित साधने में जरूर सफल हो जाते हैं।
कृषि और किसानों के लिए क्या और कितना किया जाए, इस विषय पर पिछले दो दशकों में सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर खूब विचार विमर्श हुआ तथा दोनों ही स्तर पर विशेषज्ञ समितियों की ढेरों सिफारिशे हमारे सामने है। लेकिन दोस्त कृषि सुधार की हर योजना और उपाय की बात देश के सीमित संसाधनों पर आकर अटक जाती है। यह निष्कर्ष आज निकालना कतई गलत नहीं होगा कि देश के अंदर से कृषि के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिश  हो चुकी है या हो रही है और शायद इसीलिए कुछ समय से कृषि निर्यात बढ़ा कर बदहाल होती जा रही कृषि को राहत देने की कोशिशें दिख भी रही है। लेकिन वैश्विक बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की स्थिति बेहतर अभी तक नहीं हो पाई है शायद सरकार ने यह जो नया 3 दिन बिल हम किसानों के लिए लाया है ,इससे शायद हमारे अन्नदाता के जीवन में बदलाव आ सकें।
भारत शुरू से ही कृषि प्रधान देश है, लेकिन आजाद होते ही भारत के सामने सबसे बड़ा संकट पर्याप्त भोजन की व्यवस्था का ही था । उस समय खाद्य उत्पादन हमारी मांग के हिसाब से बहुत कम था। पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत में हम 47 लाख टन हम अनाज विदेशों से मंगा रहे थे। उसके 5 वर्ष बाद दोस्त हमने अपना उत्पादन बढ़ाकर हम अपना कृषि आयात घटाकर 10 लाख टन तक ले आए, लेकिन तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान दो युद्ध और गंभीर सूखे ने कृषि की कमर तोड़ दी और सन 1966 में भारत को अपनी आबादी की खाद्य जरूरत पूरी करने के लिए एक करोड़ टन अनाज आयात करना पड़ा। इस संकट से उबरने के लिए दोस्त उसी वक्त उन्नत बीजों के इस्तेमाल की योजना से हरित क्रांति की नींव रखी गई थी। आखिर खाद्य आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल हुआ और फिर कुछ भारतीय कृषि उत्पादों का निर्यात भी शुरू हुआ, जिसमें दोस्त गेहूं प्रमुख था। उस समय से लेकर आज तक भारत में कृषि उत्पादन औसतन बढ़ता ही जा रहा है लेकिन किसानों के जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं हुआ। देखा जाए तो आजादी के बाद पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत में जो खाद्य उत्पादन करीब 5 करोड़ टन था , वह आज 28 करोड़ टन तक पहुंच चुका है, लेकिन कृषि निर्यात उस हिसाब से नहीं बढ़ पाई है। आंकड़े देखे तो कृषि निर्यात के मामले में हम आज भी वैश्विक सूची में पहले 10 देशों में भी नहीं आते हैं। अगर हम देखें तो वैश्वीकरण के इस दौर में बाजार तलाशना भी इतना आसान नहीं है। हर देश प्रतिस्पर्धा में है, ऐसे में भारत प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अभी तक निर्यात पर अलग-अलग सब्सिडी देकर अपना माल बाहर बेच रहा था। लेकिन पिछले कुछ समय से भारत पर अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह दबाव बन रहा है कि हम अपने जिन उत्पादों का निर्यात बढ़ाने के लिए सब्सिडी दे रहे हैं, उसे बंद कर दें। विश्व व्यापार संगठन में हमारी तो शिकायत भी दर्ज कराई गई है, लेकिन  अगर हम सब्सिडी बंद करते हैं तो विदेशों में भारतीय माल के दाम बढ़ जाते हैं। सब्सिडी हटाने के लिए दूसरे देशों का तर्क है कि वैश्विक बाजार में सभी उत्पादकों के लिए समान मौके होने चाहिए, सरकार के निर्यात पर सब्सिडी दे देने से दूसरे देशों के उत्पाद की बिक्री के मौके घट जाते हैं। आज वैश्विक व्यवस्था का यही दवा हमारे ऊपर है लेकिन हाल ही में लाए गए सरकार के यह तीनों बिल आखिर हमारे अन्नदाता के जीवन में किस प्रकार से सकारात्मक बदलाव लाते हैं यह तो वक्त बताएगा।