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"वेश्या" एक नाम नहीं,हमारे समाज में नारी को दिया गया उपनाम है
June 10, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
"वेश्या" एक ऐसा शब्द जिससे मुझे नफरत है, आज से नहीं जब से मैंने होश संभाला तब से  है । मुझे हैरत होती है, आखिर ये शब्द किसने बनाया ,इस शब्द को मैं सुनती हूँ तो मेरा अस्तित्व ही मिट जाता है।
वैश्याएं भी नारी होती है और मैं नारी जाति में आती हूँ, बहुत सी नारियां इस दर्द में जी रही हैं जो मुझे स्वीकार नहीं ।
क्या करूं? जो ये शब्द मिट जाए, आह नारी की पीड़ा... ।
इसमें पुरूषों का भी सहयोग होता है , फिर पुरूषों को वेश्या का नाम क्यों नहीं मिलता, नारी को ही क्यों? 
मुझे तो ये शब्द लिखते हुए भी पीड़ा हो रही है, लेकिन मैं आपलोगों से नारी का दर्द बांटना चाहती हूँ।
नारी वेश्या क्यों बनती है ...? क्या वह जन्म से वेश्या होती है या शौक से वेश्यावृत्ति को अपनाती है...? क्या उन्हें अपने परिवार की इज्जत काम ख्याल नहीं आता...
वेश्यावृत्ति का जन्म कैसे हुआ...
 आदि न जाने कितने सवाल मेरे मन को चुभ रहे थे। उन्हें क्यों समाज में घृणा की दृष्टि से देखा जाता है क्यों उन्हें वेश्या कहकर अपमानित किया जाता है। आखिर ये सब क्यों और कैसे जिस मानव सभ्यता में नर -नारी को एक साथ विकसित होने का मौका मिला फिर नारी वेश्या के दलदल में क्यों फंसी...?
चूंकि मैं किसी बड़े शहर की रहने वाली नहीं इसलिए हमारे लोगों से बातचीत के दायरे बंधे हुए हैं या यूं कहे कि हम खुल कर अपनी बातें लोगो के सामने नहीं रख पाते।
विचारो में खोई मैं एकबार अपनी दादी के पास गई । मैने कहा दादीजी लड़की वेश्या क्यों बनती है। 
वे मेरी ओर अचरज भरी नजरो से देखने लगी और मुस्करा कर बोली -क्यों रे क्या करेगी जान कर। 
मैंने कहा बताओ न दादी ऐसा क्यों करती है लड़की। वे मुस्करा कर बोली -बेटी लड़की सुन्दर होती है । उनमे कामवासना भी ज्यादा होती है । उनके शौक( क्रीम -पावडर ,खाना पीना,कपड़े ,गहने आदि )ज्यादा होते है। तो कुछ गरीबी के चलते हुए लड़को को जाल में फंसा पैसे ऐंठती है। और अपनी जरुरत को पूरा करती है। और जब लोगो की नजर में आ जाये तो वेश्या बन जाती है।
मैं बोली- दादी क्या उन्हें उनके परिवार भाई बहन आदि का ख्याल नहीं आता। इस तिरस्कार की जिंदगी में उन्हे क्या मिलता है। उनके परिवार पर क्या बीतती है। वे बोली- क्या बीतती है घर से निकाल दी जाती है। और वे भी इसे शौक से अपनाती है। और मन की सारी इच्छा पूरी करती है। मै बोली - पर दादी नारी तो कोमलता ,दयालुता और ममता की मूरत होती है जिन्हें वे शौक समझती है हो सकता है ये मानव सभ्यता में उपस्थित एक दुर्गुण हो जिसका जिम्मेदार तुम नारी को बता रही हो वह दूसरा कोई और हो ।
मेरे ऐसा बोलते ही वह बोली क्यों मेरा दिमाग खा रही है। तुझे बताया न और मुझे घुरकर देखने लगी। मै चुपचाप उठी और वहाँ से खिसक गई।
 लेकिन काफी दिन सोचने के बाद कुछ उम्र विकसित होने के बाद समझ आया कि ये "वेश्या" नाम कुछ पुरुषों की घटिया मानसिकता को दर्शाता है।
हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है। इसलिए नहीं कि औरत काबिल नहीं इसलिए कि ऐसी मान्यता बना दि गई है और जिसको ढोते अा रहे हैं सदियों से संघर्षरत महानुभाव युगपुरुष। क्योंकि कहीं ना कहीं पुरुषों क़ो  लगता है कि औरतें इनसे कमतर हैं, और जब यही औरतें इनको  चुनौती देती हैं तब ये बौखला जाते हैं और जब आप किसी औरत से हार जाते हैं तब आप बौखलाहट में अपना गुस्सा या विरोध दिखाने के लिए औरत को गाली देते हैं, ये गाली देना सिर्फ़ एक चीज़ दिखाता है, वह है आपकी “घटिया मानसिकता”।
सबसे आसान है औरत को वेश्या कहना। उससे भी आसान उसके मन को छलनी करना। आजकल सबसे आसान है उसे जीवन से पहले मृत्यु देना या थोड़ा-सा आसान यह भी कि मार देना ऑनर-किलिंग कहकर!
अरे ओ  समाज के ताकथित संभ्रांत-सूत्रधारों। ये वेश्या जिस दिन कोठे से उतर जाएंगी, तुम निर्वस्त्र हो जाओगे अपनी ही बहु-बेटियों के सामने। तुम यह नहीं जानते जब तुम कमजोर पड़ते हो या तो वेश्या की गोद में जाते हो या फिर उसे वेश्या कहकर अपनी कुंठा शांत करते हो। हर हालत में तुम वेश्या के ही अधीन हो। और मुझे लगता है वेश्या आम औरतों से ज़्यादा ताकतवर है। जो हर हाल में तुम्हारी औकात बता देती है।
वेश्या कहकर नारी क़ो अपमानित करने की लालसा रखने वाले ऐ कमअक्लों, एक पेशे को गाली बना देने की तुम्हारी फूहड़ कोशिश से तो उन पर कोई गाज़ गिरी नहीं। पर अपनी चिल्ला-पों और पोथी-लिखाई से छानकर क्या तुमने इतनी सदियों में कोई शब्द, कोई नाम ढूंढ़ निकाला?
नारी उस देह के संगीत, उसकी दिली तमन्नाओं के लिए जिसकी हर कोशिका के लिए अपनी पाखंड पंचायत में तुम कानून गढ़ते फिरते हो। एहसान मानो कि उनके  दुःस्वप्न में जो लाल घावों से रिसता है सुबह वह उसे समेट उस धधकते फूल की पोशाक बना पहन लेती  हैं।क्या हैरत नहीं होती तुम्हें कि कैसे सिनेमा हॉल में उनकी नोचती अंधेरी उंगलियों को मरोड़, अगले पल तुम उनके हाथ को सहलाने लगते हो ? उनकी इच्छाओं की बात शुरू होते ही तुम्हें दौरे पड़ने लगते है। क्या ये सोच कर अवाक् नहीं रह जाते तुम कि कोई नरम चेहरा जब उनकी ओर झुकता है तो उसकी दोनों तरफ़ तैरने वाले वीभत्स मुखौटों की स्मृतियां पीछे धकेल कैसे नारी के उस चेहरे को पंखुड़ियों-सा संभाल पाती हैं?
अगर इतनी ढ़ीठ, दिलेर, स्नेही, आशावान, अपराजिता नहीं होती उनकी इच्छाएं, तो प्रेम होता तुम्हारे लिए दिवास्वप्न और चांद को कोफ़्त होती तुमसे। तुम्हारी हथेली में ना गिरकर वो बदमिज़ाजी से आसमान में टंगा रहता। तुम भकुआए से उसकी ओर ताकते, हुआते रहते।
अब बात करती हूँ कुछ पुरषों की मर्दानगी की औकात की:-
सुबह अखबार खोलो तो बलात्कार, कत्ल, दहेज हत्या सनसनीखेज खबरों से रूबरू होते ही आगे बढते हैं कि विज्ञापनों का अम्बार।
“पौरुष शक्ति कैसे बढाएं या प्यार के पल कैसे बढ़ें या जो अपनी बीबी से करते हैं प्यार जापानी तेल से कैसे करें इन्कार या फिर चार्ज हो जाओ खुशियों की नयी ऊंचाई के लिए .”……… वगैरह वगैरह ।
एक-एक पेज पर चार-चार विज्ञापन। रोचक बात यह कि एक भी विज्ञापन महिलाओं की कामशक्ति बढ़ाने का नहीं। “कामसूत्र” ग्रंथ भी पुरुषों के लिए लिखा गया। पुरुष की शक्तिहीनता का परिचय विज्ञापनों से पता लगता है। फिर भी “नारी नरक का द्वार है” या स्त्री के लिए सम्मानसूचक शब्द समाज ने दिये – “वैश्या"।
कमजोरी पुरुष को अनुभव हुई गाली स्त्री को पड़ी। नपुंसक पुरुष हुआ बांझ स्त्री को कहा गया। सारे विज्ञापन सारे ग्रन्थ पुरुषों के लिए और स्त्री के हक में? क्या स्त्री को ऐसे काम ग्रन्थो की जरूरत नहीं होती? फिर भी समाज की सारी सीमा रेखाएं स्त्री के लिए और सारी वासनाएं पुरुष के लिए। ये असन्तुलन ही समाज को विकृति की ओर ले जाता है।
सुबह-सुबह ऐसे विज्ञापन न जाने कितने जापानी तेलों की बिक्री बढ़ाते हैं और कितने ही अपनी मर्दानगी को आजमाने के लिए बच्चियों और बूढ़ी महिलाओं तक को अपनी हवस का शिकार बना देते हैं। इसी पुरुष ने अपनी हवस को पूरा करने के लिए स्त्री को नगरवधू बना कोठे पर बिठाया और इसी पुरुष ने “नारी निकेतन” बना अपनी मस्ती और मर्दानगी को आजमाने का अड्डा बनाया।
एक सवाल कुछ पुरुष जाति से:-
अपराधी अगर स्त्री-पुरुष दोनों हैं तो स्त्री को नारी निकेतन और पुरुष को छुट्टा आजादी क्यों...?
 मैने तो यही सुना था कि पुरुष वह जो स्त्री की आंखों में आंसू न आने दे। ऐसा पुरुष कहां पाया जाता है मुझे उसका पता चाहिए...
कोई दे दो भाई। 
ऐसे विज्ञापन देख एक सवाल तो रोज उठता है कि जब पुरुष प्रधान समाज में ऐसे विज्ञापनों की भरमार होगी तो पता नहीं अभी कितनी अरुणाएं, कितनी निर्भयाएं, कितनी ही मासूम बच्चियां आबरू लुटा संसार से विदा होंगी।
काश कोई इस समाज को समझा सके कि पुरुष का पौरुष संयम और सदाचार से बढ़ता है। तुम उसे वेश्या कहते हो, उनका  बलात्कार करते हो, उनके  शरीर को गंदी निगाहों से देखते हो, उनके पेट में ही मार देते हो, सरेआम उनके कपड़े फाड़ते हो… मत भूलना ये अस्तित्व उन्ही से मयस्सर है तुम्हें।
क्या कभी देखा है किसी वैश्या को तुम्हारे घर पर कुंडी खड़का कर स्नेहिल निमंत्रण देते हुए?? नहीं न!!! ….वो तुम नीच नामर्द ही होते हो, जो उस वैश्या के दरबार में स्वर्ग तलाशने जाते हो !
वैश्यायों  का भी एक स्वर्णिम इतिहास है । आम्रपाली नाम तो आपने जरुर सुना होगा । जी हाँ ! वही आम्रपाली जिनके नाम पर उनकी कहानी बताने वाली एक सुपर हिट फिल्म भी बनी थी । इतिहास के अनुसार शायद वह पहली ज्ञात वेश्या थीं लेकिन तब के लोगों की मानसिकता में काफी फरक था । उन्हें कोई वेश्या जैसे निकृष्ट संबोधन से सबोधित नहीं करता था । दरबार की राजनर्तकी होने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ करता था । कालांतर में नगरवधू का संबोधन भी उपयुक्त ही था । लेकिन जैसे जैसे लोगों की सोच और मानसिकता ओछी होती गयी हमारे लिए अश्लील संबोधनों की बाढ़ सी आ गयी । अब ऐसे संबोधनों के बारे में न पूछ लेना । सभी जानते हैं । 
आज वैश्याओं को कई नामों से पुकारा जाता है । सोसाइटी गर्ल ‘ कॉल गर्ल से लेकर अन्य कई बदनाम नाम भी इनके ऊपर चिपका दिए जाते हैं ।
हाँ ! नामों से ही याद आया दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा ! इस प्रथा के बारे में तो आप जानते ही होंगे फिर भी संक्षिप्त में बता ही दूँ । परिवार द्वारा किये गए मन्नत के फलस्वरूप जब कन्या बड़ी हो जाती है तो उसकी शादी देवी येलम्मा से बड़े धूमधाम से करायी जाती है । अब आप सोच सकते हो शादी देवी से हुयी है । अर्थात अब उसे अपने घर गृहस्थी से कोई मतलब नहीं होता । लेकिन इसके बाद देवी के नाम पर रिवाज की दुहाई देकर मंदिर के पुजरियों द्वारा उसका सतीत्व हरण का घिनौना खेल खेला जाता है और यहीं से उसकी नारकीय यात्रा की शुरुआत होती है । पुजारियों के बाद समाज के संभ्रांत लोगों के हवस की शिकार देवदासी अंत में महानगरों में किसी कोठे की शोभा बनने को अंततः मजबूर हो जाती है । इस पुरे घटनाक्रम में इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों की भूमिका को देखो देवी को समर्पित लड़की अर्थात देवी की अमानत में भी खयानत करने से नहीं चुकते ।
हालाँकि सरकार अब इस प्रथा को ख़त्म करने की भरसक कोशिश कर रही है लेकिन जिस्म के मंडियों में नित नयी यौवनाओं की बढ़ती मांग असामाजिक तत्वों को यह अपराध करने को प्रेरित करती है । जब तक बाजार में तुम कामी पुरुषों जैसे गरम गोश्त के खरीददार आते रहेंगे ये गुंडे मवाली और बदमाश पैसों के लालच में नित नयी लड़कियों को नए नए सब्ज बाग़ दिखाकर फंसाते रहेंगे ।
हमारे समाज मे नारी जो देवी स्वरूप मानी गयी है उसकी यह दशा देखकर घिन सी आने लगी अब ऐसे पुरुषों से।
नारी की ये सिसकती आह बारंबार मेरे वजूद को रौंदती रहती है ।
रीमा मिश्रा"नव्या"
आसनसोल(पश्चिम बंगाल)