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""सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती ही एकमात्र विकल्प है""
May 23, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
 
आज कोबिड़- 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण मानव जाति अपने इतिहास के सबसे कठिन और अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है l दोस्तों शायद यह पहला अवसर है, जब मानव जाति अपने आप को घरों में कैद करने के लिए मजबूर हैं. मानव जाति स्वीकार करने को मजबूर है कि देश ,राष्ट्र,भाषा, संस्कृति, धर्म, व्यवसाय, गरीब और अमीर की सीमाएं मानव निर्मित है, अन्यथा प्रकृति के समक्ष हम सभी समान और अंत- निर्भर भी हैंl दोस्तों आज हमें प्राकृत से तालमेल बैठाने की बहुत जरूरत है आज हम घरों में कैद हैं तो कहीं ना कहीं प्राकृत स्वतंत्र हुई है जो यमुना नदी एवं गंगा नदी को स्वच्छ करने में कोई सरकार कामयाब नहीं रही ना जाने कितने बजट लाए गए लेकिन इस लॉकडाउन ने प्रकृति को स्वच्छ कर दिया है सबसे ज्यादा प्रदूषित दिल्ली आज प्रदूषण मुक्त है कहीं ना कहीं हमें बहुत जरूरत है आगे भी प्राकृत के साथ हम तालमेल बैठा कर रहे दोस्तों हम बात सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की कर रहे हैं तो इसमें प्राकृत की बात करना हमें जरूरी लगी, वैसे दोस्तों स्वास्थ्य एक व्यक्तिगत विशेषाधिकार ना होकर सामाजिक आवश्यकता है जिससे हमारा जीवन समाज और देश सीधे रूप से प्रभावित होता है.. स्वास्थ्य देश की समृद्धि और विकास को निर्धारित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है किसी भी देश का लेकिन दोस्तों नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत अपने जीडीपी का 1.28% स्वास्थ्य पर सार्वजनिक रूप से खर्च करता है जो प्रति व्यक्ति के हिसाब से स्वास्थ्य सेवाओं पर 1657 रुपए हुआ l वही भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका, इंडोनेशिया ,नेपाल और मयांमार स्वास्थ्य सेवाओं पर भारत की तुलना में अधिक खर्च कर रहे हैं जबकि विकसित राष्ट्र जैसे अमेरिका ,जर्मनी ,फ्रांस ,जापान से भारत की कोई तुलना ही नहीं है लेकिन इस वैश्विक महामारी में सभी विकसित देशों का हालत खराब है सबसे बेहतर स्थिति में अपना ही देश है लेकिन हमें स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना है डब्ल्यूएचओ ने कहा कि 1000 लोगों के लिए एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में 11,500 से अधिक लोगों के लिए केवल एक सरकारी डॉक्टर है दोस्तों निजी क्षेत्र में अधिक बेड और डॉक्टर हो सकते हैं परंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं है और भारत की अधिकतर आबादी इन स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए भी आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैl  दूसरी तरफ भारत की 69% जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में निवास करती है जहां की स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत ही बदतर स्थिति में है दोस्तों मेरा कहने का आशय यह नहीं है कि निजी क्षेत्र का योगदान सार्वजनिक सेवाओं में कमतर है मेरा कहने का मतलब इतना है कि लाभकारी विचारधारा से प्रेरित निजी क्षेत्र मानवता पर इस संकट की घड़ी में भी कार्यों को करने के लिए बाध्य नहीं है l इस कोरोना महामारी के विरुद्ध युद्ध ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व की ओर सरकार, राजनीतिक नेतृत्व, बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता का ध्यान आकर्षित किया है दोस्तों कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए हमें अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है l इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है जिला स्तर के सार्वजनिक अस्पतालों को सुपरस्पेशलिटी अस्पताल के रूप में विकसित करना, जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को अपने नजदीक ही गंभीर बीमारियों सहित सभी प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंl  दोस्तों हम देख रहे हैं कि जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन एवं मनुष्य की खानपान की आदतों में बदलाव आदि के कारण आपदाएं और महामारी हमारे जीवन का हिस्सा बनती जा रही है इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करके पहले ही रखना समय की मांग है इसके लिए विशेषकर स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा अनुसंधान पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ताकि कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए दवाओं एवं बेडो  का विकास किया जा सके नहीं तो हमें दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ेगा जो कि एक विकसित अर्थव्यवस्था के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है और स्वास्थ्य के संबंध में जागरूकता को बढ़ाने और स्वच्छता हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा होना चाहिए हमें बच्चों को विद्यालय स्तर से ही हाथों की सफाई एवं स्वच्छता से जुड़ी संभाल बातें सिखाने की जरूरत है वैसे भारत ने भी लक्ष्य रखा है कि 2025 तक जीडीपी का 2.5 % स्वास्थ्य के लिए खर्च किया जाएगा इसके लिए पूरी ईमानदारी से प्रयास करने की आवश्यकता है l दोस्तों विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनने के लिए आर्थिक विकास के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य को उच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता है भारत को भी विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर न केवल जीडीपी का बड़ा हिस्सा खर्च करने की आवश्यकता है बल्कि दुर्गा में ध्यान करने और उनका पारदर्शिता के साथ नैतिक पूर्ण क्रियान्वयन कर उनके परिणाम सुनिश्चित करना भी आवश्यक है दोस्तों अपने देश को स्वस्थ रखने के लिए हम सब का भी नैतिक रूप से जवाबदेही है कि हम जितना हो सके लोगों में जागरूकता लाएं स्वच्छता की बातें बताएं और इस वैश्विक महामारी मे अपने सामर्थ्य अनुसार वंचित तबकों का मदद करने का प्रयास करें l