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"पारंपरिक और पोषक भोजन से समृद्ध होगा हमारा संस्कृति
October 9, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
अच्छा भोजन ही हमारा प्राथमिक भोजन है, जो कि हमारे समृद्ध परंपरा से ही प्राप्त होता है। हमें वही भोजन करना चाहिए जो प्रकृति और पोषण को आजीविकाओं के साथ जोड़ता है। ऐसा भोजन करने से दोस्त  स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा है, जैसा कि आप जानते  ही हैं कि ऐसा भोजन हमें हमारी समृद्ध जैव विविधता से प्राप्त होता है जोकि लोगों को रोजगार भी प्रदान करता है। जैसा कि हम सब देख रहे हैं दोस्त की कोविड 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण जहां आज पूरा विश्व के इंसान अपने स्वास्थ्य को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक और सचेत हो चुके हैं। जहां भी देखे हम लोग हर तरफ चर्चा हो रही है कि अपनी इम्यूनिटी हम कैसे बढ़ाए , जिसके लिए लोग गिलोय, तुलसी और अदरक के साथ ही और भी विभिन्न प्रकार के औषधियों से अपने इम्यूनिटी को बढ़ा रहे हैं साथ ही हरी सब्जियों का अधिक से अधिक अब अपने घरों में जहां प्रयोग कर रहे हैं वही हम देख रहे हैं दूसरी तरफ की जैसे ही देश में लॉकडाउन में ढील दी गई फिर से लोग लापरवाही करना शुरू कर दिए हैं, देखने में आता है कि लोग मास्क तो लगाते है, ज्यादातर लोग इसलिए कि कहीं पुलिस  चलाना ना कर दें, वही अब फिर लोग स्वस्थ को लेकर उतना अपने सचेत नहीं दिख रहे हैं फास्ट फूड के तरफ फिर लोगो के जीभ से लार टपकने लगा है। दोस्त हमारे भोजन का ही संबंध हमारे संस्कृति और सबसे अधिक जैव विविधता के साथ ही हम सभी के मन मस्तिष्क पर भी होता है। आज से जंक फूड नहीं, वैसे भी मेरे अनुसार जंक फूड का मतलब होता है कूड़ा भोजन, अब आप सोच लो क्या आप कूड़ा वाला भोजन करना पसंद करोगे? नहीं बल्कि हमें अच्छा भोजन को ही प्राथमिक भोजन, यानी कि हमारा फास्ट फूड होना चाहिए जिससे हमारा आने वाला भविष्य उज्जवल हो जैसा कि आप जानते हैं कि हमारा देश युवाओं का देश है और आज सबसे अधिक हमारा युवा पीढ़ी ही जंक फूड और नशे के गिरफ्त में है। हमें हमेशा वही भोजन करना चाहिए जो प्रकृति और पोषण को हमारे आजीविकाओं के साथ भी जोड़ें जिससे कि हमारा पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।
आज आंकड़ों के अनुसार देखा जाए तो हर दूसरा व्यक्ति मोटापे का शिकार है तो वही हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का भी शिकार है कहीं ना कहीं हमारा समाज का संतुलन बिगड़ता जा रहा है , कोई ओवरन्यूट्रिशन से परेशान है तो वही कोई मालनूट्रिशन से परेशान है। इसका मतलब है कि देश में संसाधनों में बहुत ही भेदभाव है, आज देखें तो लगभग 90 प्रतिशत संसाधनों पर 10 प्रतिशत लोगों का वर्चस्व है वहीं दूसरी तरफ 10 प्रतिशत संसाधनों पर देश के लगभग 90 प्रतिशत लोग किसी तरह गुजर बसर कर रहे हैं, जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 में सभी की बराबरी की बात कही गई है लेकिन हालात क्या है यह आपके सामने है।
मेरा सवाल है कि हम खराब भोजन की इस संस्कृति में बदलाव कैसे लाएं ? देखे तो दोस्त हमारा प्रसंस्कृत खाद्य उद्योग बहुत ही ताकतवर है, युवाओं को अपने साथ इसको जोड़ने की क्षमता भी है। देखा जाए तो खानपान के रंग ,गंध और खुशबू के सहारे लोगो को लुभाते  भी हैं, उन्हें सब पता है कि कैसे लोगों को लुभाना है। यह जानते हुए भी कि यह देश के लोगों के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही बुरा है, फिर भी यह लोग लुभाते रहते हैं ताकि उनकी जेब भरा  रहे।
सबसे अहम बात तो यह है कि प्रंसकृत खाद्य उद्योग ने आज हमारी अस्त-व्यस्त जीवन शैली का फायदा उठाना भी शुरू कर दिया है। दोस्त जो भी हो यह खानपान की उनकी दुनिया उनका कारोबार है, इसीलिए चलता है क्योंकि लोगों को यह लुभाते है और उनको मुनाफा कमाना होता है। यही वजह है है कि कंपनियां भोजन को हम तक पहुंचाने की आपूर्ति श्रृंखला तैयार करती । ऐसे में सवाल यह है कि अच्छे भोजन की आपूर्ति कैसे सुनिश्चित की जाए? दोस्त हम सभी ने देखा कि जब देश में वैश्विक महामारी का कहर बढ़ने लगा तो देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया तब से लोगों ने अपने घरों में खुद से खाना बनाकर अधिकतर लोग खाने लगे जिसके कारण बहुतों का स्वास्थ्य बहुत अच्छा हुआ, इसमें सबसे पहले अपना नाम इसमें शामिल करना चाहूंगा कि जब से मैं खुद से घर का बना हुआ खाना शुरू किया हूं पहले से कहीं बहुत ही ज्यादा ऊर्जावान और ताकतवार हमेशा महसूस करता हूं इसलिए आप सभी से भी विनम्र निवेदन है कि अपने व्यस्त जीवनशैली ने भी कम से कम दिन में एक बार अपने घर का खाना बना हुआ जरूर खाने का कोशिश करें, साथी हमेशा प्रयास कीजिए कि आप हमेशा जंग फूड जैसे कूड़ा वाले भोजन से बचेंगे।