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 मौत का खौफ़ और ज़िन्दगी की तलाश
May 19, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख

अवहेलना उलाहना झेलता भूखा-प्यासा मन में एक अजीब सा डर लिए अर्थव्यवस्था का रीढ़ कहा जाने वाला मजदूर आज पैदल ही निकल पड़ा है अपने आशियाने की तरफ अपनों से मिलने। उसे पता है सामने मौत है फिर भी मन को तसल्ली देकर कहता है वह लड़ लेगा शायद इस बाहर के कोरोना वायरस से मगर अंदर भूख के वायरस से लड़े भी तो आखिर कैसे! इसी जद्दोजहद में सब कुछ पीछे छोड़ उठ पड़े उसके कदम मौत के खौफ़ में भी ज़िन्दगी की तलाश करने।
उन्हें नहीं पता कि उनका यह सफर पूरा भी होगा या नहीं! फिर भी एक उम्मीद उनके मन में कि मरना तो दोनों तरफ है आगे कुआं है तो पीछे खाईं जाएं भी तो जाएं कहाँ इसी उधेड़बुन में मन ने फैसला किया कि अपनों के बीच पहुंच कर मरना बेहतर। भूख की इस तड़प के सम्मुख कोरोना संक्रमित दर्द शायद कुछ भी नहीं। पर आखिर मरना कौन चाहता है साहेब ज़िन्दगी की तलाश में आया था यहाँ मगर जब ज़िन्दगी ही नहीं रहेगी तो यहाँ रहने से क्या फायदा चलते हैं जो भी होगा देखा जाएगा।
सिर पर सामानों की गठरी, कांधे पर औलाद का बोझ, पेट में भूख की तड़प, मन में वायरस का खौफ़ और आँखों में ज़िन्दगी की उम्मीद लिए तपती धूप में नंगे पाँव निकल पड़ा यह मजबूर मजदूर अपने गाँव की तरफ रोते-बिलखते भूख से तड़पते हुए भी तलाश रहे हैं ज़िन्दगी जो मझधार में बिन पतवार नाव माफिक फँस गई है।
आखिर इस मौत के खौफ़ में उलझी ज़िन्दगी की तलाश का कारण क्या है? इसके पीछे कौन सा सच छिपा है? क्या यह सियासी साजिश के शिकार हैं या फिर सच में मजबूर हैं? आखिर जान बूझकर मौत के बीच ज़िन्दगी की तलाश कौन करना चाहेगा? विषय बेहद ही चिंतनीय है आखिर इसके पीछे हकीकत क्या है? कहीं ये मजदूर सियासतों की आपसी रंजिश का शिकार तो नहीं बन रहें! आखिर पेट यदि भरा होता तो क्यों वह मौत के खौफ़ के बीच ज़िन्दगी की तलाश में निकलता? विषय विचारणीय है! इस पर ध्यानाकर्षक जरूरी है।