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"कोरोनाकाल के बाद शिक्षा व्यवस्था"
May 28, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
कोविड 19 के कारण अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है और बहुत से प्राइवेट कर्मचारियों की जॉब पर भी लंबे लॉक डाउन की वजह से खतरा आ चुका है या आने वाला है। बहुत सी कंपनियों ने जॉब्स में कटौती शुरू कर दी है, बहुत से लोगों को काम से बाहर करना चालू कर दिया है या सैलरी कम कर दी है। छोटे उद्योग तो बंद होने की कगार पर ही आ गए है। इनमें काम करने वाले लोगों के सामने रोजगार और घर चलाने का संकट खड़ा हो गया है। इस सबमें मैं एक खास मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ वो है शिक्षा का मुद्दा। 
शहरों में और अब तो गाँवों में भी अधिकांश लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ा रहे है। जहाँ बहुत ज्यादा फीस लगती है। अब बदली हुई परिस्थितियों में बहुत से लोगों के लिए ये संभव नहीं लग रहा। "समग्र शिक्षक संघ मप्र के प्रांताध्यक्ष सुरेशचंद्र दुबे ने पालकों से ये अनुरोध किया है कि अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल की जगह सरकारी स्कूल में भर्ती करें।" उनके इसी बयान की प्रेरणा से मुझे भी ये ख्याल आया कि ऐसे पालक क्या करें कि कम खर्च में अच्छी शिक्षा मिले।
प्राइवेट स्कूल ना तो फीस माफ कर रहे है और ना ही छूट दे रहे है। ऐसी परिस्थिति में यह अच्छा मौका है प्राइवेट स्कूलों के मकड़जाल से बाहर निकलने का। पालक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भर्ती करवाये। सरकारी स्कूलों में 8 वीं तक कोई फीस नहीं लगेगी। यूनिफार्म, पुस्तकें आदि भी मिलेगी। अब कई शासकीय स्कूल अच्छे फर्नीचर और सुविधाओं से युक्त है। सरकारी शिक्षक योग्यता परीक्षा पास करके सेवा में आये है, उनकी ट्रेनिंग लगातार चलती रहती है। जबकि प्राइवेट स्कूलों में ऐसे कोई खास मापदंडों को पूरा नहीं किया जाता।अब तो कुछ अच्छे आर्गेनाइजेशन सरकार के अलावा भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अच्छी शिक्षा देने के लिए नवाचारी शिक्षा की ट्रेनिंग दे रहे है। जिनमें अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, श्री अरबिंदो सोसाइटी, रूम टू रीड और एडुकेट गर्ल्स जैसे संस्थान प्रमुख है। 
अगर ऐसा लगता है कि बुनियादी सुविधायें सरकारी स्कूलों में कम है तो पालक संघ बनाकर जो फीस प्राइवेट स्कूलों में दे रहे थे वो यहाँ सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए दान करें। इससे धीरे धीरे स्कूलों का ढाँचा भी सुधरेगा और पालकों की निगरानी रहेगी तो शिक्षकों को भी क्वालिटी शिक्षा देना पड़ेगी। पालक शिक्षक संघ का गठन तो वैसे भी होता ही है बस इसे प्रभावी तरीके से काम करने के लिए सक्रिय करना होगा।
हर साल प्राइवेट स्कूलों में अगर 30 बच्चों के पालक एवरेज 10000 रुपये सालाना फीस भी देते है तो 3 लाख रुपये अपने गाँव की सरकारी स्कूल में सालाना दान करें। 5 साल में ही स्कूल की तस्वीर बदल जाएगी। 
हम भी सरकारी स्कूल के ही प्रोडक्ट है। हमारे स्कूली समय यानी मुश्किल से 20 साल पहले तक भी शासकीय स्कूलों की बहुत अच्छी प्रतिष्ठा थी और अच्छा काम करने वाले प्राचार्य को लोग ट्रांसफर करवाकर अपने गाँव ले जाते थे। 
शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे मुद्दे है जिनका पूर्णतः राष्ट्रीयकरण करके सिर्फ सरकारों को ही स्कूल और हॉस्पिटल चलाना चाहिए। कम से कम 12 वीं तक अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा प्रत्येक नागरिक को सरकार की तरफ से बिना किसी भेदभाव के मिलनी चाहिए। उसके बाद कॉलेज की फीस ली जा सकती है। इससे सभी नागरिकों को एक जैसी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी और प्राइवेट स्कूलों और हॉस्पिटलों की लूट से मुक्ति भी मिलेगी।
- कपिल कुमार
कौशल विकास कंसल्टेंट