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"जब हमारे अन्नदाता ही नहीं होंगे तो हम खाएंगे क्या ??""
July 26, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
हाल ही में जो सभी का पेट भरते है हमारे किसान उनकी हत्या बिहार के कटिहार जिले में कर दी गई । आखिर दोस्तों कब थमेगी हमारे अन्नदाता पर ज़ुल्म !
दोस्तों एक तरफ तो हमारे अन्नदाता उनके लागत का उचित मूल्य और अत्यधिक कर्ज होने व फसल बर्बाद हो जाने के कारण आए दिन खुदकुशी जैसे कदम उठाने को मजबूर होते हैं ,तो वही दूसरी तरफ हमारे अन्नदाता का इस प्रकार से खुलेआम हत्या आखिर क्यों नहीं सरकार हमारे किसानों के लिए सुरक्षा कानून बनाती है?
दोस्तों देखना आप कोविड 19 जैसी वैश्विक महामारी के कारण गिरती अर्थव्यवस्था को भी हमारे कृषक वर्ग ही पटरी पर लाएंगे।
दोस्तों ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इकनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट और इसके साथ ही इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनामिक रिलेशंस के एक अध्ययन के मुताबिक भी भारत में पिछले दो दशकों से खेती लगातार घाटे का सौदा बनी हुई है। दोस्तों आज आजादी के 72 साल बीत जाने के बाद भी कृषि घाटे का सौदा बनी हुई है इसके लिए सरकारी नीति ही कहीं ना कहीं परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जिम्मेदार  है । साथियों हम देखते हैं  कि हमारे यहां मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए अनाज की कीमत कम रखने पर जोर दिया जाता है जिसके कारण ही किसानों को कम कीमत मिलती है। अगर हम देखें तो बिहार में एक किसान की मासिक आय औसतन 3,558 रूपये हैं तो वही पश्चिम बंगाल में 3980 रूपये  हैं l जबकि दोस्तों पंजाब के एक किसान की मासिक आय 18,059 रुपए तक है।
दोस्तों अगर किसानों की आय को दोगुना भी कर दिया जाता है तब भी देखें तो यह आय अन्य छोटी नौकरियों और मामूली कारोबार की तुलना में बहुत ही कम है । अब आप समझ सकते हैं कि हमारे अन्नदाता आए दिन आत्महत्या जैसे कदम क्यों उठाते हैं ?
मेरे दोस्तों जैसा कि आप भी जानते  हैं कि देश में हरित क्रांति के जनक प्रोफेसर एम .एस .स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 18 नवंबर 2004 को राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था। यह आयोग ने अपने सुझाव मे बताया था कि फसल उत्पादन मूल्य से 50 प्रतिशत ज्यादा कीमत किसानों को मिले और गांवो में किसानों के मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए व फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले इसके साथ ही सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दर कम करके 4 फ़ीसदी किया जाए और लगातार प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में किसान को मदद पहुंचाने के लिए एक एग्रीकल्चर रिस्क फंड का गठन किया जाए।
लेकिन हम देख रहे हैं कि आज तक इस पर अमल नहीं किया गया है मैंने तो खुद जो नाबार्ड के माध्यम से फार्मर क्लब बनाकर किसानों को संगठित करके उनको जागरूक व हर संभव मदद करने का योजना है उसमें खुद काम किया लेकिन हमने देखा किसानों की स्थिति में सुधार के लिए कोई विशेष रूचि नहीं लेता कोई भी संस्था।
दोस्तों केंद्र सरकार के कृषि विकास व किसानों की आमदनी दो गुना करने के तमाम दावों के बावजूद किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है और दूसरी तरफ 4 दिन पहले ही हमारे बिहार के कटिहार जिले के अन्नदाता को  बदमाशों ने तो मार ही दिया ।।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो कि रिपोर्ट के मुताबिक फिर एक बार निराशाजनक आंकड़े सामने आए हैं। एनसीआरबी के मुताबिक दोस्तों 2016 में 11,379 किसानों ने खुदकुशी की है। वैसे एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में 2015 में 12,602 आत्महत्याओं के मुकाबले 2016 में खुदकुशी के कुल मामलों में कमी देखने को तो मिली है। दोस्तों किसान आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र लगातार पहले स्थान पर आज भी बना हुआ है। हमारा देश  ऐसा है जो दुनिया की सातवीं  सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, दोस्तों आप कह सकते हो ऐसे देश में हजारों की संख्या में किसानों का मरना बहुत ही चिंताजनक और अफसोस जनक मामला है। यह आंकड़ा देखकर आप भी सहम जाएंगे की हमारे यहां औसतन हर 46 मिनट में हमारे देश में कहीं ना कहीं एक किसान आत्महत्या जरूर करता है। अब मेरा सवाल यह है कि सरकार की कृषि क्षेत्र की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद किसानों की खुदकुशी रुकने का नाम क्यों नहीं ले रही है ??
हमारे अन्नदाताओ की आत्महत्या की यह तस्वीर कहीं सरकार की दोषपूर्ण नीतियों का नतीजा तो नहीं है ना ?
दोस्तों मेरे को कहने की जरूरत नहीं है कि किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला हमारे नीति निर्माताओं की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है। ऐसी नीतियां जिनसे गरीब और गरीब हो रहे हैं और अमीर और अमीर हो रहा है। जरा आप भी सोचिए क्या कारण है कि एक किसान मंडी में टमाटर प्याज 50 पैसे प्रति किलो बेचने जाता है लेकिन खरीददार और बिचौलिया 20 -25 पैसे प्रति किलो देने के लिए कहता है और वह किसान एक ट्रैक्टर से टमाटर को जमीन पर रौंदकर चला जाता है? उस किसान का जब लागत ही नहीं निकल पाएगा भाड़ा गाड़ी भी नहीं निकल पाएगा तो वह किसान 20- 25 पैसे प्रति किलोग्राम बेचने के बजाय टमाटर प्याज को जमीन पर फेंकना बेहतर समझता है ।।
दोस्तों एनसीआरबी के 2015 के रिपोर्ट के मुताबिक किसानों की आत्महत्या का सबसे प्रमुख कारण कर्ज में डूबने का ही रहा था। ध्यान से देखें तो गरीबी और बिमारी भी किसानों की आत्महत्या की अहम वजह होती है। गरीबी और बीमारी भी दोस्तों आय से सीधे जुड़ी हुई होती है, गरीबी के कारण ही लोग इलाज के लिए ऋण लेते हैं और निम्न आय के कारण कर्ज चुका  नहीं पाते हैं . और  धीरे- धीरे नतीजतन ब्याज बढ़ते रहने के कारण कर्ज के पहाड़   बढ़ता जाता है, जिसके बोझ को हमारे अन्नदाता सह नहीं पाते हैं।। दोस्तो इसी कृषि  की बदतर हालात के कारण ही किसान अपने बच्चों को खेती के बजाय कोई नौकरी करने की सलाह देते हैं और यही कारण है कि एक बड़ी आबादी गांव से शहर की ओर लगातार पलायन कर रही है। यह तस्वीर दोस्तों भारत के भविष्य के लिए खतरे की घंटी जैसी है। क्योंकि जब हमारे अन्नदाता ही नहीं रहेंगे तो हम खाएंगे क्या?
आप सभी ने भी देखा मेरे दोस्तों जब कोविड-19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन किया गया तो देश के बड़े-बड़े महानगरों और दूसरे राज्यों में प्रवासी मजदूर के रुप में अपने गांव को छोड़कर गए हुए लोगों में अधिकतर युवा वर्ग के लोग हमारे किसान परिवार से ही थे, जब लॉकडाउन किया गया था तो हजारों किलोमीटर पैदल चलने को यह प्रवासी मजदूर मजबूर हुआ जिसमें से कुछ लोग किसी बस, ट्रक और ट्रेन के नीचे दबकर मारे गए तो कुछ लोग हमने देखा कि भूखे- प्यासे मारे गए जिनमें हमारे अन्नदाता के भी बच्चे थे । यह अन्नदाता के बच्चे अपने घर के माली स्थिति को सुधारने के लिए गए थे जो  जाकर बड़े-बड़े महानगरों में किसी कंपनी या अपना छोटा- मोटा रोजगार करते थे।। आपको बता दें कि चीन में छोटे और सीमांत किसानों को ब्याज मुक्त या निम्न ब्याज दरों पर कर्ज दिया जाता है और भी दूसरे देशों में किसानों के लिए कई प्रकार के सुरक्षा कानून है फिर हमारे यहां क्यों नहीं किसानों के लिए सुरक्षा कानून बनता है ??
कवि विक्रम क्रांतिकारी (चिंतक/पत्रकार / आईएएस मेंटर/अध्येता
दिल्ली विश्वविद्यालय - अध्येता 9069821319