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 भारतीय अर्थव्यवस्था
May 30, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख

मनुष्य की सम्पूर्ण आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन व विश्लेषण करने वाली विधा अर्थशास्त्र है और इसी अर्थशास्त्र का व्यावहारिक पक्ष 'अर्थव्यवस्था' है। अर्थव्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसकी सहायता से कोई भी देश अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग और नवनिर्माण करता है। अर्थव्यवस्था से सीमित उपभोग और सीमित संसाधनों के बीच की खाईं पटती है। जिससे उपभोक्ता ज्यादा संतुष्ट हो सके, जिससे उत्पादक भी लाभान्वित हों और समाज में अधिकतम सामाजिक कल्याण सुनिश्चित हो सके।
आर्थिक उदारीकरण के दौर में 'अर्थ' मानव की तमाम गतिविधियों का नियामक बन चुका है।
जिस अर्थव्यवस्था में संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व होता है वह समाजवादी या नियंत्रणकारी अर्थव्यवस्था कहलाती है जो कि चीन, उत्तर कोरिया, क्यूबा में देखने को मिलती है।
जिस अर्थव्यवस्था में माँग व पूर्ति के कारकों का प्रभुत्व हो वह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था कहलाती है इसमें राज्य व सरकार की भूमिका सीमित होती है।
जिस अर्थव्यवस्था में समाजवादी व पूँजीवादी दोनों अर्थव्यवस्थाओं का लक्षण मौजूद हो मिश्रित अर्थव्यवस्था कहलाती है। यह अर्थव्यवस्था हमारे अपने देश भारत में मौजूद है। जहाँ तक हमारे भारत देश का सवाल है तो यहाँ विकासशील अर्थव्यवस्था पाई जाती है और विकासशील अर्थव्यवस्था का मतलब जहाँ अपने संसाधनों का समुचित दोहन नहीं हो पाया। यहाँ औद्योगीकरण की प्रक्रिया देर से शुरू हुई। १९४०-५० के दशक में औपनिवेशिक स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले अधिकांश देशों में यही अर्थव्यवस्था है। ऐसी अर्थव्यवस्था की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की भागीदारी में गिरावट व औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्रों की भागीदारी में वृद्धि देखी जाती है। वर्तमान में भारत देश में भी यही अर्थव्यवस्था व विकास के द्वितीय चरण का प्रभुत्व है। वैसे इस विकास को बढ़ाने हेतु अनेक योजनाएँ आर्थिक नीतियों की शुरुआत तेजी से हो रही है इसमें मुख्य रूप से निर्वाह कृषि क्षेत्र को वैज्ञानिक तौर-तरीके से सुदृढ़ किया जा रहा है। आत्मनिर्भर बनने की पहल तेज हुई है कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिससे हम कह सकते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एन एस ओ) के रिपोर्ट के अनुसार देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर बीते वर्ष २०१९-२० की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में घटकर ३.१ फीसदी पर आ गई है। इसका काफी हद तक कारण कोविड 19 की वैश्विक महामारी भी रही है जिसमें उपभोक्ता उत्पाद की मांग काफी कम रही। यह आंकड़ा इससे पहले २००८-०९ में रही थी। हालांकि कृषि क्षेत्र की जीडीपी में वृद्धि इस चौथी तिमाही में बढ़कर ५.९ होना राहत की बात है जो पिछली तिमाही में १.६ फीसदी थी।
वहीं कुछ सेवा क्षेत्रों के भी आर्थिक वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। कृषि क्षेत्र की जीडीपी में वृद्धि कृषि पर विशेष ध्यान दिए जाने के बाद देखा गया यह ध्यान बहुत पहले दिया जाना चाहिए था। इस वैश्विक महामारी से जिस आर्थिक मंदी का सामना हमें करने को मिल रहा है वह शायद काफी हद तक कम रहता। आज लघु और कुटीर उद्योगों पर जो ध्यान महामारी के बाद दिया गया वह पहले दिया जाना चाहिए था तो यह आत्मनिर्भरता की तस्वीर ही कुछ अलग होती सरकारों पर जो यह आर्थिक मंदी का बोझ है काफी हद तक कम होता।
स्वदेशी अपनाने की पहल बेहद प्रभावशाली प्रयास है हम विदेशी वस्तुओं पर जो पैसा लगाते थे वह अब हमारे राजस्व की हिस्सेदारी में सहयोगी होगा। जो नीतियां आज अपनाई गई अगर यह पहले अपनाई गई होती तो आत्मनिर्भरता की दहलीज पर हम बहुत पहले पहुंच चुके होते। इन सभी बातों को दरकिनार करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था खुद को मजबूत करने में प्रयासरत है मेक इन इंडिया का विशेष प्रभाव देखा जा रहा है। लोग स्वदेशी अपनाने में उत्सुक नजर आ रहे हैं। ऐसे में सरकार को इन कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान देना होगा ताकि यह उत्सुकता आत्मनिर्भरता का हिस्सा बन सके।
चीनी की घिनौनी हरकत से जो वैश्विक विरोध चरम पर है और देश की जनता का चीन के उत्पादों के बहिष्कार की यह जो आवाज आज उठ रही है सरकार को उस अवसर को भुनाना होगा। मेक इन इंडिया प्रोडक्ट मार्केट में उतरकर खुद की नीतियों को साबित करना चाहिए। ऐसा अनुमान है कि अर्थव्यवस्था में सुधार जरूर देखा जाएगा एक अलग भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर विश्व पटल पर नजर आएगी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति बढ़ेगी और मेक इन इंडिया उत्पादों की मांग में भी बढ़ोत्तरी दर्ज होने की उम्मीद रहेगी।