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 अंतरराष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस बनाम वैश्विक महामारी : कोविड-19
May 31, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख

जैसा कि हम जानते हैं कि १ जून अंतरराष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस के रूप में लगभग पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इस दिवस को पहली बार १ जून १९५० में ५१ देशों के द्वारा मनाया गया था। तब से लेकर आज तक यह दिवस बच्चों के प्रोत्साहन हेतु खासकर करके अनाथ, गरीब और दिव्यांग बालकों की प्रोन्नति हेतु एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि बच्चे किसी भी देश के भविष्य होते हैं इनकी सुरक्षा करना हर देश का मुख्य कर्म है। अगर हमारे बच्चे सुरक्षित होंगे तो हमारे देश का भविष्य भी उज्ज्वल होगा। बच्चों की सुरक्षा और उनके मूल अधिकारों को बचाने के लिए इस दिवस की शुरुआत हुई थी।
बाल सुरक्षा दिवस का मुख्य उद्देश्य बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने वाले कार्यक्रमों को लागू करना और बाल मजदूरी से बच्चों को बचाना है। आज के दिन बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजन के माध्यम से बच्चों की समस्याओं का निराकरण करते हुए और उनको उपहार व सम्मान भेंट किया जाता है। गरीब, अनाथ और दिव्यांग बालकों की मदद हेतु आश्वासन दिया जाता है। नृत्य संगीत कार्यक्रम के साथ विभिन्न प्रकार की शिक्षाप्रद प्रदर्शनियां आयोजित की जाती है।
पर आज की यह विपरीत परिस्थितियां जो कोविड-19 की वजह से उभरी हैं यह इस बाल सुरक्षा दिवस को फीका कर सकता है। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 महामारी २०२० के अंत तक ८.६ करोड़ बच्चों को गरीबी में धकेल सकती है जिससे इस अंतरराष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस के उद्देश्य पर विपरीत प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि कोरोना महामारी से पैदा हुए आर्थिक संकट के कारण २०२० के अंत तक कम और मध्यम आय वाले देशों के गरीब घरों में रहने वाले बच्चों की संख्या में ८.६ करोड़ तक बढ़ सकती है। आज कोविड-19 वायरस के कारण अब तक लगभग पूरी दुनिया में ५६९५२९० लोग संक्रमित और ३५५६९२ लोगों की मौत हो चुकी है। इन आंकड़ों में बच्चों की भी अधिकता है जिसमें डब्ल्यू एच ओ के रिपोर्टों में साफ तौर पर कहा गया है कि यह कोविड-19 वायरस बुजुर्गों और बच्चों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है और यह बात साबित भी हुई है अब तक करोड़ों बच्चों की जान जा चुकी है इस वैश्विक महामारी में, ऐसे में बच्चों का यह त्यौहार कैसा रहेगा हम सब समझ सकते हैं।
आज की इस वैश्विक महामारी का पूरा असर इस अंतरराष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस पर देखा जा सकता है। इस महामारी के चलते जब कम व मध्यम आय वर्गीय परिवार आज रास्ते पर आ चुका है ऐसे में उन परिवारों का हिस्सा बना बच्चा अपने तमाम अधिकारों से वंचित हो चुका है। आखिर ऐसे में देश के भविष्य का निर्माण करने वाले इन गरीब, बेसहारा और दिव्यांग बच्चों का क्या होगा? इस वर्ष इस अंतरराष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस को एक अलग तरीके से मनाने की बारी है। घर से बेघर हुए इन बच्चों को सहारे के अहम जरूरत है उनकी शिक्षा जो इस वैश्विक महामारी के चलते पूर्णतः प्रभावित हो चुकी है फिर से पटरी पर लाना होगा। उनके भरण-पोषण का उचित प्रबंधन करना जरूरी है तभी एक सुंदरतम भविष्य का निर्माण संभव है। यदि ऐसा करने में कोई भी देश चूक गया तो वहाँ बाल मजदूरों में इजाफा जरूर देखा जाएगा। भूख-प्यास से मरने वाले बच्चों का ग्राफ ऊपर उठेगा जो किसी भी देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है। जरूरत है इस अंतरराष्ट्रीय बाल सुरक्षा दिवस को कुछ अलग करने की ताकि देश के भविष्य निर्माणक इन बेसहारा, गरीब और दिव्यांग बालकों के मूल अधिकारों की रक्षा की जा सके तभी एक सुदृढ़ समाज की कल्पना संभव है और इससे हमारा आगे आने वाला कल भी सशक्त होगा।

रचनाकार :- मिथलेश सिंह 'मिलिंद'