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"आलोचना"
May 27, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
आलोचना जिसका शाब्दिक अर्थ होता है-"गुण या दोष बताना"।वर्तमान परिवेश में यदि देखा जाय तो हर कोई चाहता है कि उसको जितना अधिक से अधिक प्रशंसा मिले,चाहे झूठी ही क्यों न हो।ताज्जुब तो तब होता है, जब मनुष्य इस प्रशंसा के चक्कर के तर्क भी नही कर पाता कि सामने वाला सच भी कह रहा है या नही।इस समय अगर किसी की खूब प्रशंसा करो तो वो आपका मित्र रहेगा,और यदि आपने उसकी आलोचना की फिर सारे रिश्ते नाते खत्म।यही आज के युग में बहुत बड़ी दुविधा है।
                                    अगर कोई किसी की आलोचना करता है,तो ये जरूरी नही की वो कमी निकाल रहा हो,ये भी तो हो सकता है,कि वो आलोचना के माध्यम से आपकी कमी को दूर कर के आपके लिए एक उन्नत मार्ग प्रशस्त कर रहा हो।परन्तु विडम्बना ये है कि मनुष्य अपनी आलोचना नही सुनना चाहता,और यदि किसी भी मनुष्य ने अपनी आलोचना स्वीकार कर ली तो निश्चित वो अपनी कमियां दूर कर के सफलता के शिखर पर पहुंच जाएगा।कहा भी गया है-"निंदक नियरे राखिए,आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।"