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दैवो दुर्बल घातकः समरूप कोरोना काल
May 25, 2020 • Brajesh Kumar Mourya • लेख
दैवो दुर्बल घातकः अर्थात् कहा जाता है कि भगवान भी दुर्बल को मारते हैं। कोरोना रूपी इस वैश्विक महामारी ने आज जो परिस्थितियां उत्पन की है उस परिस्थितियों से दुर्बल अर्थात् शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से जो कमजोर है वही सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। डब्ल्यू एच ओ की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना विषाणु उन्हीं लोगों पर सबसे ज्यादा प्रभावी है जो शारीरिक व मानसिक रूप से दुर्बल हैं जिसमें ६५ वर्ष के बुजुर्ग, गर्भधारण स्त्रियाँ और नवजात शिशु आते हैं। 
चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत 'योग्यतम की उत्तरजीविता' अर्थात् सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट के अनुसार जिस प्रक्रिया द्वारा किसी जनसंख्या में कोई जैविक गुण कम या ज्यादा हो जाता है उसे 'प्राकृतिक चयन' कहा जाता है। यह प्रक्रिया एक धीमी गति से अनवरत चलती रहती है। प्राकृतिक चयन का अर्थ उन गुणों से है जो किसी प्रजाति को बचे रहने और प्रजनन में  सहायता करते हैं। इसका मतलब साफ है किसी भी परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढ़ाल लेना ही जीवन को गतिमान बनाता है। आज मानव के सम्मुख कोरोना महामारी ने जो परिस्थितियां उत्पन की है उस परिस्थितियों में जीना समस्त मानवीय जाति खासतौर पर शारीरिक रूप से दुर्बल मानव को भी सीखना होगा। 
इस कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते बहुत तीव्र गति से दुनिया के बदलते स्वरूप को सबने बहुत ही नजदीक से देखा जिसके चलते हमारी अपनी दुनिया में भी आमूलचूल परिवर्तन का आना स्वाभाविक था। असीमित आवश्यकताओं में जीवनयापन करने वाला मानव अचानक से सीमित संसाधनों में भी जिन्दा है यह उसके योग्यतम की उत्तरजीविता की ही देन है। 
अतः यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि हमारे अनेकानेक आविष्कार हमारी प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने में नाकाफी हैं क्योंकि प्राथमिक आवश्यकताओं से वंचित मानव सदैव दुर्बल होगा। हमारी यह प्राथमिक आवश्यकता हमारे स्वस्थ्य व सुरक्षित जीवन से जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि शारीरिक, मानसिक व आर्थिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने जीवन के लिए अनवरत लड़ता है। 
इस कोरोना काल में 'दैवो दुर्बल घातकः' से सबसे ज्यादा प्रभावित दुर्बल मानव को भी 'योग्यतम की उत्तरजीविता' को अपनाना होगा तभी वह इस कोरोना काल से अपने जीवन की रक्षा कर पाएगा। हो सकता है कि कोरोना काल खत्म हो जाए अथवा नहीं भी, हो सकता है हमें आगे भविष्य में भी कोरोना के साथ ही जीवन जीना पड़े इसके लिए जरूरत है अपनी दुर्बलताओं को दरकिनार करने की और खुद को शारीरिक, मानसिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की ताकि हम कोरोना रूपी महामारी से लड़ते हुए अपने जीवन को सुरक्षित व समृद्ध बना सकें। 
रचनाकार :- मिथलेश सिंह 'मिलिंद'