इस वसुधा का श्रेष्ठ तपस्वी
पुरुषार्थी- सच्चा - इन्सान।
निशिदिन कठिन तपस्या करता,
कहलाता मजदूर किसान।।
दिन में दिनकर ज्वाला बरसे,
चाहे हिमकर हिमपात करें।
या ऋतुराज धरा पर आकर
उनके श्रम पर राज करें।
अगणित रातों को जाग-जाग
जीवन सुख निद्रा, त्याग-त्याग।
हल-फल से मिट्टी फाड़-फाड़
नन्हें बीजों को गाड़-गाड़
निज श्रम का ध्वज फहराने हित
उस पर पाटा चलवाते हो।
श्रम सीकर से अभिसिंचित कर,
नव-जीवन उसमें लाते हो।।
शीत-शिशिर में ठिठुर-ठिठुर,
पानी से खेत पटाते हो।
कम्बल, लिहाफ, स्वेटर विहीन।
खेतों में निशा बिताते हो।।
मजदूर जो ठंडी रातों में,
अस्थियों को अस्त्र बनाते हैं।
हेमन्त शिशिर ऋतुओं से लड़
गेहूँ-सरसों उपजाते हैं।।
सोने सम सुन्दर दानों को,
हर महलों तक पहुँचाते हैं।
श्रम के फलदान के एवज में
बस तिरस्कार ही पाते हैं।
फिर जेठ दोपहरी में तप-तप,
गन्ने की फसल उगाते हैं।
अपने गुड़-शक्कर शीरा खा,
सबको चीनी भेजवाते हैं।
पश्चिम से आता गर्म पवन,
जब दीरघ दाध बढ़ाता है।
तब झुलस-झुल कर खेतों में
श्रम-तप का धर्म निभाता है।।
श्रम की गर्मी तन का सम्बल,
जाड़ों में बन जाता कम्बल।
श्रम-श्वेद तरल बन आता है
तपता तन, तर कर जाता है।।
पावस ऋतु में नित भीग-भीग
कम्पित हो लेव लगाते हो।
झुक-झुक घुटनों की टेक लिये,
कीचड़ में धान उगाते हो।
कुछ दिवस गये सारा कीचड़,
हरियाली में छिप जाता है।
श्रम तेरा छिपा हुआ उसमें
बाली -बनकर लहराता है।।
हे श्रम साधक, जग के दधिचि,
श्रम-सीकर खेतों में उलीचि।
जग को सर्वस्व समर्पित कर,
बन जाते मरु के मृग -मरीच।।
तन के मांसों का जला -जला,
खेतों में भस्म बनाते हो।
भस्मों में भस्माभूत हुये,
सूखा तन ले, घर आते हो।।
शस्य विकास, सुरक्षा हित,
ना दिवस-निशा तूने जाना।
बाढ़ अकाल बड़ विपदा से,
ना कभी हार तूने माना।।
अगणित दैवी विपदा झेले,
जल -जला, ज्वाला, जल से खेले
जब-जब भीषण विध्वंस हुआ,
उससे उन्नत उत्कर्ष हुआ।।
भू को भूकंप हिलाता है,
भीषण विध्वंस मचाता है।
तेरे अदम्य पौरुष समक्ष,
वह नतमस्तक हो जाता है।
संकट - विपदा जब -जब आयी,
बस क्षणिक क्लान्त ही कर पायीं
तेरे अनुपम धीरज समक्ष
विपदा ने सदा मात खायी।।
आवाहन
मजदूर किसानों अब जागो,
तू दानी हो कुछ मत मांगों।
हक कभी न मांगे जाते हैं,
भुजबल से छीने जाते हैं।।
पांडव मांगे थे पांच गाँव,
पा सके न कोई एक गाँव।
रण में जब अस्त्र धार आये,
आशा हक से ज्यादा पाये।
हो एक साथ यदि जग जाओ।
किंचित मन मंथन कर पाओ।
निज स्वाभिमान के रक्षाहित
हल लेकर हलधर बन जाओ।
तूँ सचमुच हो शेषावतार,
धरणी को धारण करते हो।
पर गुहतर भार लिये जग का
सब मौन भाव से सहते हो।।
अपने सहस्र फन को समेट,
बस एक बार फुफकार करो।
तू क्या हो किंचित स्मरण कर,
हे हलधर बस हुंकार भरो।
दिग्पालों तक हिल जायेंगे,
तेरे समक्ष झुक जायेंगे।
ऊँचे आसन पर बैठे सब,
काले कौवे उड़ जायेंगे।।
मतदान से जिन्हें बनाते हो,
ऊँचे आसन बैठाते हो।
जो सचमुच तेरे सेवक हैं,
उनके सेवक बन जाते हो।।
तन से श्रम-सीकर बहा-बहा
खुशियों के दीप जलाते हो।
जग को खुशियों से जग-मग कर
खुद धन - तम में सो जाते हो।।
तू दीन-बन्धु मन के महेश,
तू विध्न विनाशक हो गणेश।
निज श्रम ताप से कल्याण करो।
दीनों दुखियों की भूख हरो।।
तू सच्चे -सन्त पुजारी हो,
हर आदर के अधिकारी हो।
क्यों उपेक्षित रह जाते हो।
रह मौन सभी सह जाते हो।।
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